श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 27: राजा पुरञ्जन की नगरी पर चण्डवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  4.27.6 
तस्यामजनयत्पुत्रान् पुरञ्जन्यां पुरञ्जन: ।
शतान्येकादश विराडायुषोऽर्धमथात्यगात् ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
तब नारद मुनि ने महाराज प्राचीनबर्हिषत को सम्बोधित करते हुए कहा: हे दीर्घायु महाराज! इस प्रकार राजा पुरञ्जन ने अपनी पत्नी पुरञ्जनी के गर्भ से १,१०० पुत्रों को जन्म दिया था। परन्तु इस कार्य में उनका आधा जीवन बीत गया।
 
Then Sage Narada addressed King Prachinbarhisat and said: O Virata, in this way King Purañjana begot 1,100 sons from the womb of his wife Purañjani. But half of his life was spent in this task.
तात्पर्य
इस श्लोक में कुछ सार्थक शब्द हैं, जिनमें से पहले शब्द हैं एकादश शतानि। पुरंजना ने अपनी पत्नी का गर्भ से 1,100 पुत्रों को जन्म देकर इस तरह से अपने आधे जीवन को गुजार दिया था। वास्तव में, हर आदमी इसी तरह की प्रक्रिया का अनुसरण करता है। अगर कोई एक सौ साल तक पूरी तरह से जीता है, तो अपने पारिवारिक जीवन में वह केवल पचास की उम्र तक ही संतान प्राप्त करता है। दुर्भाग्यवश, मौजूदा समय में लोग एक सौ साल तक भी नहीं जीते हैं; फिर भी, वे साठ साल की उम्र तक बच्चे पैदा करते हैं। एक और बिंदु यह है कि पहले लोग एक सौ से दो सौ पुत्र और पुत्रियाँ पैदा करते थे। जैसा कि अगले श्लोक से स्पष्ट होगा, राजा पुरंजना ने केवल 1,100 पुत्रों को ही जन्म नहीं दिया था, बल्कि 110 पुत्रियों को भी जन्म दिया था। मौजूदा समय में कोई भी इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को जन्म नहीं दे सकता है। इसके स्थान पर, मानवता निरोधक उपायों द्वारा जनसंख्या वृद्धि को रोकने में काफ़ी व्यस्त है। हम वैदिक साहित्यों में यह नहीं पाते हैं कि लोगों ने कभी निरोधक उपायों का उपयोग किया हो, जबकि वे सैकड़ों बच्चे पैदा करते थे। निरोधक उपायों से जनसंख्या पर नियंत्रण रखना एक और पापपूर्ण कार्य है, लेकिन कलि युग में लोग इतने पापी हो गए हैं कि वे अपने पापपूर्ण जीवन के परिणामों की परवाह नहीं करते हैं। राजा पुरंजना अपनी पत्नी, पुरंजन के साथ रहे, और भारी संख्या में बच्चों को जन्म दिया, और इन श्लोकों में इस बात का कोई उल्लेख नहीं है कि उन्होंने निरोधक उपायों का उपयोग किया था। वैदिक शास्त्रों के अनुसार, निरोधक उपाय यौन जीवन में संयम होना चाहिए। यह नहीं है कि व्यक्ति को असीमित यौन जीवन जीना चाहिए और गर्भावस्था को रोकने के लिए किसी उपाय का उपयोग करके बच्चों को प्राप्त करने से बचना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति अच्छी चेतना में है, तो वह अपनी धार्मिक पत्नी से सलाह लेता है, और इस सलाह के परिणामस्वरूप, बुद्धि के साथ, व्यक्ति जीवन के मूल्य का अनुमान लगाने की अपनी क्षमता में प्रगति करता है। दूसरे शब्दों में, अगर कोई इतना भाग्यशाली है कि उसके पास एक अच्छी, कर्तव्यनिष्ठ पत्नी है, तो वह आपसी सलाह से यह निर्णय ले सकता है कि मानव जीवन कृष्ण चेतना को आगे बढ़ाने के लिए है, न कि बड़ी संख्या में बच्चे पैदा करने के लिए। बच्चों को परिणाम, या उप-उत्पाद कहा जाता है, और जब कोई अपनी अच्छी बुद्धि से परामर्श करता है, तो वह देख सकता है कि उसके उप-उत्पाद उसकी कृष्ण चेतना का विस्तार होना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)