श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 27: राजा पुरञ्जन की नगरी पर चण्डवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.27.5 
तयैवं रममाणस्य कामकश्मलचेतस: ।
क्षणार्धमिव राजेन्द्र व्यतिक्रान्तं नवं वय: ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
अरे राजन प्राचीनबर्हिषत्, इस प्रकार राजा पुरञ्जन काम और पाप के कर्मफलों से भरे हुए हृदय के साथ अपनी पत्नी के साथ सुख-विलास करने लगा और इस तरह आधे पल में ही उसका नया जीवन और यौवन समाप्त हो गया।
 
अरे राजन प्राचीनबर्हिषत्, इस प्रकार राजा पुरञ्जन काम और पाप के कर्मफलों से भरे हुए हृदय के साथ अपनी पत्नी के साथ सुख-विलास करने लगा और इस तरह आधे पल में ही उसका नया जीवन और यौवन समाप्त हो गया।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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