अथो भजस्व मां भद्र भजन्तीं मे दयां कुरु ।
एतावान् पौरुषो धर्मो यदार्ताननुकम्पते ॥ २६ ॥
अनुवाद
काल कन्या ने आगे कहा: हे भद्र, मैं आपकी सेवा में हाजिर हूँ। कृपया मुझे स्वीकार करके कृपा करें। पुरुष का सबसे बड़ा कर्तव्य है कि वह दुखी व्यक्ति पर दया करे।
Kaal Kanya further said: O gentleman, I am present for your service. Please accept me and have mercy on me. The greatest duty of a man is to show compassion to a person in distress.
तात्पर्य
यवन-राज, यवनों के राजा, भी कालकन्या, समय की पुत्री, को अस्वीकार कर सकते थे, लेकिन उन्होंने नारद मुनि के आदेश के कारण अनुरोध पर विचार किया। इस प्रकार उन्होंने कालकन्या को एक अलग तरीके से स्वीकार किया। दूसरे शब्दों में, नारद मुनि के निषेध, या भक्ति सेवा का मार्ग, तीनों लोकों में किसी के द्वारा भी स्वीकार किया जा सकता है, और निश्चित रूप से यवनों के राजा द्वारा। स्वयं भगवान चैतन्य ने सभी से हर गाँव और शहर में, पूरी दुनिया में भक्ति-योग के पंथ का प्रचार करने का अनुरोध किया। कृष्ण चेतना आंदोलन में प्रचारकों ने वास्तव में अनुभव किया है कि यवन और म्लेच्छ भी नारद मुनि के पंचरात्रिक-विधि के बल पर आध्यात्मिक जीवन ले चुके हैं। जब मानवता वैष्णव क्रम का अनुसरण करती है, जैसा कि चैतन्य महाप्रभु द्वारा अनुशंसित किया गया है, तो दुनिया भर में सभी को लाभ होगा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥