श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 27: राजा पुरञ्जन की नगरी पर चण्डवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  4.27.25 
द्वाविमावनुशोचन्ति बालावसदवग्रहौ ।
यल्लोकशास्त्रोपनतं न राति न तदिच्छति ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
वे लोग जो रीति-रिवाजों या धर्मशास्त्रों के अनुसार दान नहीं देते हैं और जो इस प्रकार के दान को स्वीकार नहीं करते हैं, उन्हें तमोगुण से युक्त समझा जाना चाहिए। ऐसे लोग मूर्खों के मार्ग का अनुसरण करते हैं। निश्चित रूप से उन्हें अंत में पछताना पड़ेगा।
 
One who does not give charity according to the customs or injunctions of the scriptures and one who does not accept such charity should both be considered as being in the mode of ignorance. Such people follow the path of fools. They will surely have to repent in the end.
तात्पर्य
यहाँ कहा गया है कि वास्तव में शुभ जीवन चाहते हैं तो शास्त्रों का कठोरता से पालन करना चाहिए। वही भगवद् गीता (16.23) में समझाया गया है:

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य

वर्तते कामकारतः

न स सिद्धिमवाप्नोति

न सुखं न परां गतिम्

"जो शास्त्रीय आज्ञाओं को त्याग देता है और अपनी इच्छाओं के अनुसार कार्य करता है, वह न तो पूर्णता प्राप्त करता है, न सुख और न ही सर्वोच्च गंतव्य।" जो वैदिक आज्ञाओं की शर्तों का सख्ती से पालन नहीं करता है, वह कभी भी जीवन में सफलता या खुशी प्राप्त नहीं करता है। और ईश्वर के पास घर लौटने की बात तो क्या करें।

एक शास्त्रीय आदेश है कि एक गृहस्थ, एक क्षत्रिय या एक प्रशासनिक प्रमुख को एक महिला को स्वीकार करने से इंकार नहीं करना चाहिए यदि वह स्वेच्छा से पत्नी बनने का अनुरोध करती है। चूंकि टाइम की बेटी कालकन्या को नारद मुनि ने यवन राजा को उनकी पत्नी बनने का प्रस्ताव देने के लिए नियुक्त किया था, इसलिए यवन राजा उसे मना नहीं कर सकता था। सभी लेन-देन शास्त्रीय आज्ञाओं के आलोक में ही करने चाहिए। नारद मुनि जैसे महान संतों द्वारा शास्त्रीय आज्ञाओं की पुष्टि की जाती है। जैसा कि नरसिंह दास ठाकुर द्वारा कहा गया है, साधु-शास्त्र-गुरु-वाक्य, चित्तते करिया एक्य: व्यक्ति को साधु पुरुषों, शास्त्रों और आध्यात्मिक गुरु के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। इस तरह से निश्चित रूप से जीवन में सफलता मिलती है। काल की बेटी कालकन्या, साधु, शास्त्र और गुरु की शर्तों के अनुसार यवन राजा के सामने स्वयं उपस्थित हुई थी। इस प्रकार उसे स्वीकार न करने का कोई कारण नहीं था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)