यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य
वर्तते कामकारतः
न स सिद्धिमवाप्नोति
न सुखं न परां गतिम्
"जो शास्त्रीय आज्ञाओं को त्याग देता है और अपनी इच्छाओं के अनुसार कार्य करता है, वह न तो पूर्णता प्राप्त करता है, न सुख और न ही सर्वोच्च गंतव्य।" जो वैदिक आज्ञाओं की शर्तों का सख्ती से पालन नहीं करता है, वह कभी भी जीवन में सफलता या खुशी प्राप्त नहीं करता है। और ईश्वर के पास घर लौटने की बात तो क्या करें।
एक शास्त्रीय आदेश है कि एक गृहस्थ, एक क्षत्रिय या एक प्रशासनिक प्रमुख को एक महिला को स्वीकार करने से इंकार नहीं करना चाहिए यदि वह स्वेच्छा से पत्नी बनने का अनुरोध करती है। चूंकि टाइम की बेटी कालकन्या को नारद मुनि ने यवन राजा को उनकी पत्नी बनने का प्रस्ताव देने के लिए नियुक्त किया था, इसलिए यवन राजा उसे मना नहीं कर सकता था। सभी लेन-देन शास्त्रीय आज्ञाओं के आलोक में ही करने चाहिए। नारद मुनि जैसे महान संतों द्वारा शास्त्रीय आज्ञाओं की पुष्टि की जाती है। जैसा कि नरसिंह दास ठाकुर द्वारा कहा गया है, साधु-शास्त्र-गुरु-वाक्य, चित्तते करिया एक्य: व्यक्ति को साधु पुरुषों, शास्त्रों और आध्यात्मिक गुरु के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। इस तरह से निश्चित रूप से जीवन में सफलता मिलती है। काल की बेटी कालकन्या, साधु, शास्त्र और गुरु की शर्तों के अनुसार यवन राजा के सामने स्वयं उपस्थित हुई थी। इस प्रकार उसे स्वीकार न करने का कोई कारण नहीं था।
