श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 27: राजा पुरञ्जन की नगरी पर चण्डवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  4.27.24 
ऋषभं यवनानां त्वां वृणे वीरेप्सितं पतिम् ।
सङ्कल्पस्त्वयि भूतानां कृत: किल न रिष्यति ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
काल-कन्या यवनों के राजा के पास पहुँची और उसे वीर रूप में सम्बोधित करते हुए कहा : "महाशय, आप अछूतों में सर्वश्रेष्ठ हैं। मैं आपसे प्रेम करती हूँ और आपको अपना पति बनाना चाहती हूँ। मुझे पता है कि जो कोई भी आपसे मित्रता करता है, वह निराश नहीं होता।"
 
काल-कन्या यवनों के राजा के पास पहुँची और उसे वीर रूप में सम्बोधित करते हुए कहा : "महाशय, आप अछूतों में सर्वश्रेष्ठ हैं। मैं आपसे प्रेम करती हूँ और आपको अपना पति बनाना चाहती हूँ। मुझे पता है कि जो कोई भी आपसे मित्रता करता है, वह निराश नहीं होता।"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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