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श्लोक 4.27.24  |
ऋषभं यवनानां त्वां वृणे वीरेप्सितं पतिम् ।
सङ्कल्पस्त्वयि भूतानां कृत: किल न रिष्यति ॥ २४ ॥ |
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| अनुवाद |
| काल-कन्या यवनों के राजा के पास पहुँची और उसे वीर रूप में सम्बोधित करते हुए कहा : "महाशय, आप अछूतों में सर्वश्रेष्ठ हैं। मैं आपसे प्रेम करती हूँ और आपको अपना पति बनाना चाहती हूँ। मुझे पता है कि जो कोई भी आपसे मित्रता करता है, वह निराश नहीं होता।" |
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| काल-कन्या यवनों के राजा के पास पहुँची और उसे वीर रूप में सम्बोधित करते हुए कहा : "महाशय, आप अछूतों में सर्वश्रेष्ठ हैं। मैं आपसे प्रेम करती हूँ और आपको अपना पति बनाना चाहती हूँ। मुझे पता है कि जो कोई भी आपसे मित्रता करता है, वह निराश नहीं होता।" |
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