श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 27: राजा पुरञ्जन की नगरी पर चण्डवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  4.27.23 
ततो विहतसङ्कल्पा कन्यका यवनेश्वरम् ।
मयोपदिष्टमासाद्य वव्रे नाम्ना भयं पतिम् ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
जब वह मेरे कारण निराश हो गई, तो मेरी अनुमति से वह यवनों के राजा, जिसका नाम भय था, के पास गई और उसे अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया।
 
Thus, when she became disappointed with me, with my permission she went to the king of the Yavans whose name was Bhaya and accepted him as her husband.
तात्पर्य
सबसे श्रेष्ठ वैष्णव होने के नाते, श्री नारद मुनि हमेशा दूसरों का भला करने को इच्छुक रहते हैं, यहाँ तक कि उन्हें शाप देने वालों का भी। हालाँकि समय की पुत्री कालकन्या को नारद मुनि ने अस्वीकार कर दिया था, लेकिन उन्हें आश्रय दिया गया था। निश्चित रूप से कोई भी उन्हें आश्रय नहीं दे सकता था, लेकिन एक वैष्णव ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण लड़की को कहीं न कहीं आश्रय देता है। जब जरा या वृद्धावस्था आक्रमण करती है, तो हर कोई घटता और बिगड़ता जाता है। एक झटके में नारद मुनि ने कालकन्या को आश्रय दिया और सामान्य कर्मियों पर पलटवार किया। यदि कोई नारद मुनि के निर्देशों को स्वीकार करता है, तो उस महान वैष्णव की कृपा से डर (भय) के सागर को बहुत जल्दी दूर किया जा सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)