महर्षि नारदजी ने आगे कहा : जब मैंने उस नागकन्या की प्रार्थना स्वीकार नहीं की तो वह बहुत क्रोधित हो गई और मुझे बहुत शाप देने लगी। उसने कहा कि क्योंकि मैंने उसकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की, इसलिए मैं कहीं भी एक जगह टिककर नहीं रह पाऊँगा।
Maharishi Narada further said: When I refused her request, she became very angry with me and started cursing me severely. Since I refused her request, she said that you will not be able to stay at one place for long.
तात्पर्य
महान ऋषि नारद मुनि का शरीर आध्यात्मिक है; इसलिए बुढ़ापा, बीमारी, जन्म और मृत्यु का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। नारद परम भगवान के सबसे दयालु भक्त हैं, और उनका एकमात्र काम पूरे ब्रह्मांड में भ्रमण करना और भगवान की चेतना का प्रचार करना है। दूसरे शब्दों में, उनका काम सभी को वैष्णव बनाना है। परिस्थितियों में, सामान्य तौर पर उन्हें प्रचार के लिए आवश्यक समय से अधिक समय तक एक स्थान पर रहने की आवश्यकता नहीं होती है। चूंकि अपनी स्वतंत्र इच्छा से वे पहले से ही पूरे ब्रह्मांड में यात्रा कर रहे हैं, इसलिए कालकन्या के श्राप को भाग्यशाली के रूप में वर्णित किया गया है। नारद मुनि की तरह ही, भगवान के कई अन्य भक्त विभिन्न स्थानों और विभिन्न ब्रह्मांडों में भगवान की महिमा का प्रचार करने में लगे हुए हैं। ऐसे व्यक्तित्व भौतिक नियमों के अधिकार क्षेत्र से परे हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥