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श्लोक 4.27.22  |
मयि संरभ्य विपुलमदाच्छापं सुदु:सहम् ।
स्थातुमर्हसि नैकत्र मद्याच्ञाविमुखो मुने ॥ २२ ॥ |
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| अनुवाद |
| महर्षि नारदजी ने आगे कहा : जब मैंने उस नागकन्या की प्रार्थना स्वीकार नहीं की तो वह बहुत क्रोधित हो गई और मुझे बहुत शाप देने लगी। उसने कहा कि क्योंकि मैंने उसकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की, इसलिए मैं कहीं भी एक जगह टिककर नहीं रह पाऊँगा। |
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| महर्षि नारदजी ने आगे कहा : जब मैंने उस नागकन्या की प्रार्थना स्वीकार नहीं की तो वह बहुत क्रोधित हो गई और मुझे बहुत शाप देने लगी। उसने कहा कि क्योंकि मैंने उसकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की, इसलिए मैं कहीं भी एक जगह टिककर नहीं रह पाऊँगा। |
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