श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 27: राजा पुरञ्जन की नगरी पर चण्डवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  4.27.22 
मयि संरभ्य विपुलमदाच्छापं सुदु:सहम् ।
स्थातुमर्हसि नैकत्र मद्याच्ञाविमुखो मुने ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
महर्षि नारदजी ने आगे कहा : जब मैंने उस नागकन्या की प्रार्थना स्वीकार नहीं की तो वह बहुत क्रोधित हो गई और मुझे बहुत शाप देने लगी। उसने कहा कि क्योंकि मैंने उसकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की, इसलिए मैं कहीं भी एक जगह टिककर नहीं रह पाऊँगा।
 
महर्षि नारदजी ने आगे कहा : जब मैंने उस नागकन्या की प्रार्थना स्वीकार नहीं की तो वह बहुत क्रोधित हो गई और मुझे बहुत शाप देने लगी। उसने कहा कि क्योंकि मैंने उसकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की, इसलिए मैं कहीं भी एक जगह टिककर नहीं रह पाऊँगा।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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