श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 27: राजा पुरञ्जन की नगरी पर चण्डवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  4.27.21 
कदाचिदटमाना सा ब्रह्मलोकान्महीं गतम् ।
वव्रे बृहद्‌व्रतं मां तु जानती काममोहिता ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
जब मैं ब्रह्मलोक से इस पृथ्वी पर आ रहा था, तो संसार भर में भ्रमण करती हुई काल की बेटी से मेरी मुलाकात हुई। मुझे एक सच्चे ब्रह्मचारी के रूप में जानकर वह मुझ पर आसक्त हो गई और उसने मुझसे विवाह करने का प्रस्ताव रखा।
 
Once when I was coming to this earth from the highest region, Brahmaloka, while roaming around the world, I met the daughter of Kaal. Knowing that I am a celibate, she became very lustful towards me and proposed that I should adopt her.
तात्पर्य
महान ऋषि नारद मुनि एक नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे यानी कि उनका कभी यौन जीवन नहीं रहा। वे परिणामस्वरूप हमेशा युवा बने रहे। बुढ़ापा या जरा, उन पर हमला नहीं कर सका। बुढ़ापे का निरर्थकपन एक सामान्य इंसान पर तो हावी हो जाता था, लेकिन नारद मुनि अलग थे। नारद मुनि को एक सामान्य इंसान समझते हुए, काल की पुत्री ने अपनी कामुक इच्छा के साथ उनका सामना किया। एक स्त्री के आकर्षण का विरोध करने के लिए बहुत बड़ी शक्ति की जरूरत होती है। वृद्ध पुरुषों के लिए यह मुश्किल है, और युवकों के बारे में तो कहना ही क्या। जो लोग ब्रह्मचारी होते हैं, उन्हें महान ऋषि नारद मुनि के पदचिन्हों पर चलना चाहिए, जिन्होंने जरा के प्रस्तावों को कभी स्वीकार नहीं किया। जो लोग अधिक कामुक होते हैं, वे जरा के शिकार हो जाते हैं, और बहुत जल्दी उनके जीवन काल का अंत हो जाता है। कृष्ण चेतना के लिए मानवीय रूप का उपयोग किए बिना ही जरा के शिकार इस संसार में बहुत जल्दी मर जाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)