श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 27: राजा पुरञ्जन की नगरी पर चण्डवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  4.27.19 
कालस्य दुहिता काचित्‍त्रिलोकीं वरमिच्छती ।
पर्यटन्ती न बर्हिष्मन् प्रत्यनन्दत कश्चन ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजा प्राचीनबर्हिषत्, इस समय समय की पुत्री तीनों लोकों में पति की तलाश कर रही थी। यद्यपि कोई भी उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुआ, फिर भी वह भटकती रही।
 
O King Prācānābarhiṣat, at this very time the daughter of Kaal was searching for a husband in the three worlds. Though no one was ready to accept her, she kept roaming around.
तात्पर्य
समय बीतने के साथ, जब शरीर बूढ़ा हो जाता है और लगभग अपंग हो जाता है, यह वृद्धावस्था के कष्टों जरा के अधीन हो जाता है। दुख के चार मूलभूत प्रकार हैं - जन्म, वृद्धावस्था, बीमारी और मृत्यु। कोई भी वैज्ञानिक या दार्शनिक कभी भी इन चार दयनीय स्थितियों का समाधान नहीं कर पाया है। वृद्धावस्था की अपंगता जिसे जरा के रूप में जाना जाता है, यहाँ लाक्षणिक रूप से समय की बेटी के रूप में समझाया गया है। उसे कोई पसंद नहीं करता है, लेकिन वह किसी को भी अपने पति के रूप में स्वीकार करने के लिए बहुत उत्सुक रहती है। कोई भी बूढ़ा और अपंग होना पसंद नहीं करता है, लेकिन यह हर किसी के लिए अपरिहार्य है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)