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श्लोक 4.27.18  |
स एव पुर्यां मधुभुक्पञ्चालेषु स्वपार्षदै: ।
उपनीतं बलिं गृह्णन् स्त्रीजितो नाविदद्भयम् ॥ १८ ॥ |
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| अनुवाद |
| राजा पुरञ्जन पञ्चाल नाम की नगरी में कर वसूल करता और उस धन से विषय-वासनाओं में लिप्त रहता था। स्त्रियों के वश में होकर वह समझ ही नहीं पाया कि उसका जीवन बीतता जा रहा है और वह मृत्यु के मुँह में जा रहा है। |
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| राजा पुरञ्जन पञ्चाल नाम की नगरी में कर वसूल करता और उस धन से विषय-वासनाओं में लिप्त रहता था। स्त्रियों के वश में होकर वह समझ ही नहीं पाया कि उसका जीवन बीतता जा रहा है और वह मृत्यु के मुँह में जा रहा है। |
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