श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 27: राजा पुरञ्जन की नगरी पर चण्डवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  4.27.16 
स सप्तभि: शतैरेको विंशत्या च शतं समा: ।
पुरञ्जनपुराध्यक्षो गन्धर्वैर्युयुधे बली ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
राजा पुरञ्जन नगर का रक्षक पाँच फनों वाला सर्प एक सौ वर्षों तक गंधर्वों से लड़ता रहा। यद्यपि उनकी संख्या ७२० थी, तब भी उसने उनसे अकेले ही युद्ध किया।
 
The five-headed serpent, who was the protector of the city of King Purañjana, fought with the Gandharvas for a hundred years. He fought them alone even though their number was 720.
तात्पर्य
360 दिन और 360 रातें मिलकर काण्डवेगा (समय) के 720 सैनिक बन जाते हैं। मनुष्य को जीवन काल में जन्म से मृत्यु तक इन सैनिकों से लड़ना पड़ता है। इस लड़ाई को अस्तित्व का संघर्ष कहा जाता है। इस संघर्ष के बावजूद, जीवात्मा मरता नहीं है। जैसा कि भगवद् गीता (2.20) में पुष्टि की गई है, जीव अनादि है:

ना जायते म्रियते वा कदाचिं

नायं भूत्वा भविता वा न भूयः

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो

न हन्यते हन्यामाने शरीरे

"आत्मा के लिए न कभी जन्म होता है और न कभी मृत्यु होती है। और एक बार होने के बाद, वह कभी नहीं मरता। वह अजन्मा, शाश्वत, सदा-वर्तमान, अमर और पुरातन है। शरीर के नष्ट होने पर भी उसका नाश नहीं होता है।" वास्तव में जीव न तो जन्म लेता है और न ही मरता है, लेकिन उसे अपने जीवन काल में प्रकृति के कठोर नियमों से लड़ना पड़ता है। उसे विभिन्न प्रकार की दुखद परिस्थितियों का भी सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद, जीव माया के कारण सोचता है कि वह इंद्रियतृप्ति में सुखी है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)