श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 27: राजा पुरञ्जन की नगरी पर चण्डवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.27.15 
ते चण्डवेगानुचरा: पुरञ्जनपुरं यदा ।
हर्तुमारेभिरे तत्र प्रत्यषेधत्प्रजागर: ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
जब राजा गन्धर्वराज (चण्डवेग) तथ उसके साथी पुरञ्जन नगर को लूटने आ पहुँचे, तो पाँच फनों वाला एक नाग नगर की रक्षा करने के लिए आ खड़ा हुआ।
 
When King Gandharvaraj (Chandveg) and his servants started looting the city of Puranjan, a serpent with five hoods started guarding the city.
तात्पर्य
जब कोई सो रहा होता है, तो प्राण वायु विभिन्न सपनों में सक्रिय रहती है। सांप के पाँच फन इस बात का संकेत देते हैं कि प्राण वायु पाँच प्रकार की वायु से घिरी होती है, जिन्हें प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान कहा जाता है। जब शरीर निष्क्रिय होता है, तो प्राण, या प्राण वायु, सक्रिय होती है। पचास वर्ष की आयु तक व्यक्ति इंद्रिय तृप्ति के लिए सक्रिय रूप से काम कर सकता है, लेकिन पचासवें वर्ष के बाद उसकी ऊर्जा कम हो जाती है, हालाँकि वह बहुत अधिक तनाव के साथ दो या तीन और वर्षों तक काम कर सकता है - शायद पचपनवें वर्ष तक। इस प्रकार पचपनवें वर्ष को आमतौर पर सरकारी नियमों द्वारा सेवानिवृत्ति के अंतिम वर्ष के रूप में लिया जाता है। ऊर्जा, जो पचास साल बाद थक जाती है, यहाँ लाक्षणिक रूप से पाँच फणों वाले सर्प के रूप में वर्णित की गई है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)