"इदमद्य मया लब्धं
इमं प्राष्ये मनोरथम
इदमस्तीदमपि मे
भविष्यति पुनर्धनम
असौ मया हत: शत्रु
हनिष्ये चापरानपि
ईश्वरोऽहं अहं भोगी
सिद्धोऽहं बलवान् सुखी
आढ्योंऽभिजनवानस्मि
कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य
इत्यज्ञाना विमोहिता:"
"राक्षसी व्यक्ति सोचता है: 'मेरे पास आज इतना धन है, और मैं अपनी योजनाओं के अनुसार और अधिक प्राप्त करूँगा। अब मेरे पास इतना है, और यह भविष्य में और अधिक बढ़ता रहेगा। वह मेरा दुश्मन है, और मैंने उसे मार दिया है; और मेरे अन्य शत्रु भी मारे जाएँगे। मैं हर चीज का स्वामी हूं, मैं भोक्ता हूं, मैं पूर्ण, शक्तिशाली और खुश हूं। मैं सबसे धनी आदमी हूं, जो कुलीन रिश्तेदारों से घिरा हुआ है। मेरे जैसा कोई शक्तिशाली और खुश नहीं है। मैं यज्ञ करूँगा, मैं कुछ दान दूँगा, और इस तरह मैं आनन्दित होऊँगा।' इस तरह, ऐसे लोग अज्ञानता से भ्रमित हो जाते हैं। "
इस प्रकार लोग विभिन्न श्रमसाध्य गतिविधियों में संलग्न होते हैं, और शरीर, घर, परिवार, राष्ट्र और समुदाय के लिए उनका लगाव अधिक से अधिक गहरा होता जाता है।
