श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 27: राजा पुरञ्जन की नगरी पर चण्डवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  4.27.10 
तेषु तद्रिक्थहारेषु गृहकोशानुजीविषु ।
निरूढेन ममत्वेन विषयेष्वन्वबध्यत ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
ये पुत्र और पौत्र किसी प्रकार से पुरंजयण के घर, खजाना, नौकर, सचिव और दूसरे सारे साजो-सामान सहित सारी धन-संपत्ति को लूटने वाले थे। क्योंकि राजा पुरंजयण का इन सभी वस्तुओं से गहरा संबंध था।
 
These sons and grandsons were going to loot all the wealth and property of Puranjan including his house, treasury, servants, secretaries and other paraphernalia. King Puranjan had a deep relationship with these things.
तात्पर्य
इस श्लोक में शब्द 'रिक्‍था हारेषु' जिसका अर्थ 'धन के लुटेरे' है, बहुत महत्‍वपूर्ण है। किसी के बेटा, पोता और दूसरा वंशज अंततः उसकी जमा धन के लुटेरे होते हैं। कई प्रसिद्ध व्यवसायी और उद्योगपति होते हैं जो बहुत धन कमाते हैं और लोगों द्वारा खूब प्रशंसा पाते हैं, लेकिन उनका सारा पैसा अंततः उनके बेटों और पोतों द्वारा लूट लिया जाता है। भारत में हमने वास्तव में एक उद्योगपति को देखा है, जो राजा पुरंजन की तरह, यौन रूप से बहुत इच्छुक था और उसकी आधी दर्जन पत्नी थीं। इन पत्नियों में से हर एक का एक अलग प्रतिष्ठान था, जिसके लिए कई हजारों रुपये खर्च करने पड़ते थे। जब मैं उनसे बातचीत करने लगा, तो मैंने देखा कि वह पैसे जुटाने में बहुत व्यस्त था ताकि उसके सभी बेटे और बेटियों को कम से कम पांच लाख रुपये मिल सकें। इस तरह के उद्योगपतियों, व्यापारियों या कर्मियों को शास्त्रों में 'मूढ़' कहा जाता है। वे बहुत मेहनत करते हैं, पैसा जमा करते हैं, और यह देखकर संतुष्ट होते हैं कि यह पैसा उनके बेटों और पोतों द्वारा लूट लिया गया है। ऐसे लोग अपना धन उसके वास्तविक मालिक को वापस नहीं करना चाहते। जैसा कि भगवद गीता (5.29) में कहा गया है: भोक्‍तारं यज्ञ-तपसामा सर्व-लोक-महेश्‍वरम: सभी धन का वास्तविक मालिक भगवान है। वह वास्तविक उपभोक्ता है। पैसे के कथित कमाने वाले वे हैं जो केवल चालें जानते हैं जिसके द्वारा वे व्यापार और उद्योग की आड़ में भगवान का पैसा ले जा सकते हैं। इस धन को जमा करने के बाद, वे इसे अपने बेटों और पोतों द्वारा लूटते हुए देखने का आनंद लेते हैं। यह भौतिकवादी जीवन का तरीका है। भौतिकवादी जीवन में व्यक्ति शरीर के अंदर बंदी होता है और झूठी अहंकार से भ्रमित होता है। इस प्रकार वह सोचता है, "मैं यह शरीर हूँ," "मैं एक इंसान हूं," "मैं एक अमेरिकी हूं," "मैं एक भारतीय हूं।" यह शारीरिक अवधारणा झूठे अहंकार के कारण है। झूठे अहंकार से बहककर, वह खुद को एक निश्चित परिवार, राष्ट्र या समुदाय के साथ पहचानता है। इस तरह भौतिक दुनिया के लिए उसका लगाव गहरा और गहरा होता जाता है। इस प्रकार जीव के लिए अपने उलझाव से खुद को निकालना बहुत मुश्किल हो जाता है। ऐसे लोगों का वर्णन भगवद गीता के सोलहवें अध्याय (16.13-15) में इस प्रकार किया गया है:

"इदमद्य मया लब्धं

इमं प्राष्‍ये मनोरथम

इदमस्तीदमपि मे

भविष्‍यति पुनर्धनम

असौ मया हत: शत्रु

हनिष्‍ये चापरानपि

ईश्‍वरोऽहं अहं भोगी

सिद्धोऽहं बलवान् सुखी

आढ्‍योंऽभिजनवानस्‍मि

कोऽन्‍योऽस्ति सदृशो मया

यक्ष्‍ये दास्‍यामि मोदिष्‍य

इत्‍यज्ञाना विमोहिता:"

"राक्षसी व्यक्ति सोचता है: 'मेरे पास आज इतना धन है, और मैं अपनी योजनाओं के अनुसार और अधिक प्राप्त करूँगा। अब मेरे पास इतना है, और यह भविष्य में और अधिक बढ़ता रहेगा। वह मेरा दुश्मन है, और मैंने उसे मार दिया है; और मेरे अन्य शत्रु भी मारे जाएँगे। मैं हर चीज का स्वामी हूं, मैं भोक्ता हूं, मैं पूर्ण, शक्तिशाली और खुश हूं। मैं सबसे धनी आदमी हूं, जो कुलीन रिश्तेदारों से घिरा हुआ है। मेरे जैसा कोई शक्तिशाली और खुश नहीं है। मैं यज्ञ करूँगा, मैं कुछ दान दूँगा, और इस तरह मैं आनन्दित होऊँगा।' इस तरह, ऐसे लोग अज्ञानता से भ्रमित हो जाते हैं। "

इस प्रकार लोग विभिन्न श्रमसाध्य गतिविधियों में संलग्न होते हैं, और शरीर, घर, परिवार, राष्ट्र और समुदाय के लिए उनका लगाव अधिक से अधिक गहरा होता जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)