वक्त्रं न ते वितिलकं मलिनं विहर्षं
संरम्भभीममविमृष्टमपेतरागम् ।
पश्ये स्तनावपि शुचोपहतौ सुजातौ
बिम्बाधरं विगतकुङ्कुमपङ्करागम् ॥ २५ ॥
अनुवाद
प्रिये, आज तक मैंने तुम्हारे माथे पर तिलक बबिना कभी नहीं देखा, मैंने तुम्हें कभी इतनी हताश, नीरस और स्नेहशून्य भी नहीं देखा। मैंने तुम्हारे स्तनों को आँसुओं से भीगा हुआ कभी नहीं देखा, मैंने तुम्हारे बिंबफल जैसे लाल होठों को कभी इस रंग से वंचित नहीं पाया।
Dear one, till today I have never seen your face without a tilak, nor have I ever seen you sad and devoid of radiance or affection. Nor have I seen both your breasts wet with tears. Nor have I ever seen your lips, which are as red as bimba fruits, devoid of redness.
तात्पर्य
तिलक और सिंदूर से सजी हुई प्रत्येक स्त्री बहुत ही सुंदर दिखती है। लाल केसर या सिंदूर से होठों पर रंग चढ़ने पर आम तौर पर स्त्री बहुत ही आकर्षक हो जाती है। पर जब किसी की चेतना और बुद्धि कृष्ण के तेज विचारों से रहित हो जाते हैं, तो वे उदास और नीरस हो जाते हैं, यहाँ तक कि किसी के तीक्ष्ण बुद्धि के बावजूद कोई लाभ प्राप्त नहीं कर सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)