श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 26: राजा पुरञ्जन का आखेट के लिए जाना और रानी का क्रुद्ध  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  4.26.12 
आत्मानमर्हयां चक्रे धूपालेपस्रगादिभि: ।
साध्वलङ्कृतसर्वाङ्गो महिष्यामादधे मन: ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात्, राजा पुरञ्जन ने अपने शरीर को उचित आभूषणों से सजाया। उसने चन्दन के सुगंधित लेप को अपने शरीर पर लगाया और फूलों की मालाएँ पहनीं। इस प्रकार वह पूरी तरह से तरोताजा हो गया। इसके बाद, वह अपनी रानी की तलाश करने लगा।
 
After that King Puranjana wore suitable ornaments on his body. He applied sandalwood paste on his body and wore garland of flowers. Thus he was completely refreshed (rested). After this he started searching for his queen.
तात्पर्य
जब मनुष्‍य श्रेष्ठ चेतना को प्राप्त कर, साधु पुरुष को आध्‍यात्मिक गुरु के रूप में स्‍वीकार करता है, तो वह दर्शन, कहानियों, भक्‍तजनों के वर्णनों और भगवान् और उनके भक्‍तों के बीच की बातचीत के रूप में अनेक वैदिक निर्देश सुनता है। इस प्रकार एक मनुष्‍य काचित्‍त मन से पुनर्उत्‍तेजित होता है, बिल्‍‍कुल उस व्‍यक्ति की तरह जो अपनी सम्‍पूर्ण काया पर चंदन का सुगंधित लेप लगाता है और आभूषणों से स्‍वयं को सुशोभित करता है। ये शोभाएँ धर्म और आत्‍मा के ज्ञान की तुलना में हो सकती हैं। इस प्रकार के ज्ञान से व्‍यक्ति भौतिक जीवन शैली से विरक्‍त हो जाता है और वह सदैव श्रीमद भागवतम्, भगवद-गीता तथा अन्‍य वैदिक साहित्‍यों को सुनने में संलग्‍न हो जाता है। इस श्‍लोक में प्रयुक्‍त शब्‍द साध्‍व-अलं‍कृत यह संकेत करता है कि व्‍यक्ति को साधु पुरुषों के निर्देशों से प्राप्‍त ज्ञान में तल्‍लीन होना चाहिए। जैसे राजा पुरंजन अपनी उत्तम अर्धांगिनी, रानी की खोज में निकला था, उसी प्रकार ज्ञान और साधु पुरुषों के निर्देशों से जो सुशोभित है उसे अपनी मौलिक चेतना, कृष्‍ण- चेतना की खोज में निकलना चाहिए। कोई भी कृष्‍ण चेतना में तब तक नहीं लौट सकता जब तक वह किसी साधु पुरुष के निर्देशों से अनुग्रहीत न हो जाए। अत: श्रील नरोत्‍तम दास ठाकुर गाता है, साधु-शास्‍त्र-गुरु-वाक्‍य, चित्तेते करिया एक्‍य। यदि हम साधु बनना चाहते हैं, या यदि हम अपनी मौलिक कृष्‍ण चेतना को लौटना चाहते हैं, तो हमें साधु (साधु पुरुष), शास्‍त्र (प्रामाणिक वैदिक साहित्‍य) और गुरु (एक प्रामाणिक आध्‍यात्मिक गुरु) के साथ साहचर्य स्‍थापित करना चाहिए। यह प्रक्रिया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)