अत्र ते कथयिष्येऽमुमितिहासं पुरातनम् ।
पुरञ्जनस्य चरितं निबोध गदतो मम ॥ ९ ॥
अनुवाद
इस संबंध में मैं एक पुरानी कहानी सुनाना चाहता हूं जो पुरञ्जन नामक राजा के चरित्र से संबंधित है। कृपया इसे ध्यानपूर्वक सुनें।
In this connection I want to tell you an ancient story which is related to the life of a king named Puranjan. Listen to it carefully.
तात्पर्य
महान ऋषि नारद मुनि ने एक अलग विषय की ओर रुख किया, राजा पुरंजन का इतिहास। इसे राजा प्रचीनबर्हिषत के इतिहास से कुछ अलग रूप में कहा गया है। दूसरे शब्दों में, यह एक प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण है। पुरं-जन का अर्थ है "वह जो शरीर में रहकर आनंद लेता है"। अगले कुछ अध्यायों में इसे स्पष्ट रूप से समझाया गया है। क्योंकि भौतिक क्रियाओं में उलझे हुए व्यक्ति भौतिक गतिविधियों की कहानियाँ सुनना चाहते हैं, नारद मुनि राजा पुरंजन के विषयों की ओर मुखातिब हुए, जो कोई और नहीं बल्कि राजा प्रचीनबर्हिषत हैं। नारद मुनि ने सीधे तौर पर उन बलिदानों के मूल्य को कम नहीं आंका जिसमें जानवरों की बलि दी जाती है। हालाँकि, भगवान बुद्ध ने सीधे तौर पर सभी पशु बलि को अस्वीकार कर दिया। श्रील जयदेव गोस्वामी ने कहा है, निंदसि यज्ञ-विधेर अहह श्रुति-जातम। श्रुति-जातम शब्द इंगित करता है कि वेदों में पशु बलि की सिफारिश की जाती है, लेकिन जानवरों की बलि को रोकने के लिए भगवान बुद्ध ने सीधे वैदिक अधिकार को अस्वीकार कर दिया। परिणामस्वरूप भगवान बुद्ध को वेदों के अनुयायियों द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता है। क्योंकि वह वेदों के अधिकार को स्वीकार नहीं करते हैं, भगवान बुद्ध को एक अज्ञेयवादी या नास्तिक के रूप में चित्रित किया जाता है। महान ऋषि नारद वेदों के अधिकार की निंदा नहीं कर सकते, लेकिन वह राजा प्रचीनबर्हिषत को यह बताना चाहते थे कि कर्म-काण्ड का मार्ग बहुत कठिन और जोखिम भरा है। मूर्ख व्यक्ति इंद्रिय भोग के लिए कर्म-काण्ड के कठिन मार्ग को स्वीकार करते हैं, और जो लोग इंद्रिय भोग से बहुत अधिक जुड़े होते हैं, उन्हें मूढ़ (रास्कल) कहा जाता है। एक मूढ़ के लिए जीवन के अंतिम लक्ष्य को समझना बहुत मुश्किल है। कृष्ण चेतना आंदोलन के प्रचार में, हम वास्तव में देखते हैं कि कई लोग आकर्षित नहीं होते हैं क्योंकि वे फलदायी गतिविधि में लिप्त मूढ़ हैं। कहा जाता है, उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शांति: : अगर एक मूर्ख बदमाश को अच्छे निर्देश दिए जाते हैं, तो वह बस क्रोधित हो जाता है और उन निर्देशों का लाभ उठाने के बजाय उनके खिलाफ हो जाता है। चूंकि नारद मुनि इसे अच्छी तरह से जानते थे, इसलिए उन्होंने राजा को पूरे जीवन का इतिहास देकर उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से निर्देश दिया। सोने या हीरे की नाक की पिन या कान की बाली पहनने के लिए, कान या नाक छिदवाना पड़ता है। कर्म-कांड के मार्ग, फलदायी गतिविधि के मार्ग पर इंद्रिय तृप्ति के लिए सहन किए गए इस तरह के दर्द को सहन किया जाता है। यदि कोई भविष्य में कुछ भोगना चाहता है, तो उसे वर्तमान में परेशानी सहनी होगी। यदि कोई भविष्य में एक करोड़पति बनना चाहता है और अपनी संपत्ति का आनंद उठाना चाहता है, तो उसे पैसा जमा करने के लिए वर्तमान समय में बहुत मेहनत करनी होगी। यह कर्म-कांडीया है। जो लोग ऐसे मार्ग से बहुत अधिक जुड़े होते हैं, वे वैसे भी जोखिम उठाते हैं। नारद मुनि राजा प्रचीनबर्हिषत को दिखाना चाहते थे कि फलदायी गतिविधि में शामिल होने के लिए व्यक्ति किस तरह बड़ी परेशानियों और दुखों से गुजरता है। एक व्यक्ति जो भौतिक गतिविधि से बहुत अधिक जुड़ा हुआ है, उसे विषयी कहा जाता है। विषयी विषय का उपभोक्ता है, जिसका अर्थ है खाना, सोना, संभोग करना और बचाव करना। नारद मुनि राजा पुरंजन की कहानी के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत दे रहे हैं कि खाना, सोना, संभोग करना और बचाव करना परेशानी और जोखिम भरा है। इतिहासम शब्द, "इतिहास," और पुरुषताम शब्द, "पुराना," संकेत करते हैं कि यद्यपि एक जीवित व्यक्ति भौतिक शरीर के भीतर रहता है, भौतिक शरीर के भीतर जीवित व्यक्ति का इतिहास बहुत पुराना है। इस संबंध में, श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने गाया है, अनादि करमा-फले, पड़ी' भवारणव-जले, तारिबार ना देखि उपाय : "अपनी पिछली फलदायी गतिविधियों के कारण मैं भौतिक अस्तित्व के पानी में गिर गया हूं, और मुझे इससे निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा है।" प्रत्येक जीवित व्यक्ति पिछली गतिविधियों से इस भौतिक अस्तित्व में पीड़ित है; इसलिए हर किसी का एक बहुत पुराना इतिहास है। मूर्ख भौतिक वैज्ञानिकों ने स्वयं के विकास के सिद्धांत गढ़ लिए हैं, जो केवल भौतिक शरीर से संबंधित हैं। लेकिन वास्तव में यह वास्तविक विकास नहीं है। वास्तविक विकास उस जीवित इकाई का इतिहास है, जो पुरंजन है, "शरीर के भीतर रहने वाला।" श्री नारद मुनि इस विकासवादी सिद्धांत को समझदार व्यक्तियों की समझ के लिए एक अलग तरीके से समझाएंगे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥