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श्लोक 4.25.53  |
निऋर्तिर्नाम पश्चाद् द्वास्तया याति पुरञ्जन: ।
वैशसं नाम विषयं लुब्धकेन समन्वित: ॥ ५३ ॥ |
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| अनुवाद |
| पश्चिमी दिशा में एक और द्वार था जिसे निर्ऋति कहा जाता था। पुरञ्जन इस द्वार से होते हुए अपने मित्र लुब्धक के साथ वैशस नामक स्थान पर जाया करता था। |
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| पश्चिमी दिशा में एक और द्वार था जिसे निर्ऋति कहा जाता था। पुरञ्जन इस द्वार से होते हुए अपने मित्र लुब्धक के साथ वैशस नामक स्थान पर जाया करता था। |
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