श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  4.25.53 
निऋर्तिर्नाम पश्चाद् द्वास्तया याति पुरञ्जन: ।
वैशसं नाम विषयं लुब्धकेन समन्वित: ॥ ५३ ॥
 
 
अनुवाद
पश्चिमी दिशा में एक और द्वार था जिसे निर्ऋति कहा जाता था। पुरञ्जन इस द्वार से होते हुए अपने मित्र लुब्धक के साथ वैशस नामक स्थान पर जाया करता था।
 
The second gate on the west side was called Nirriti. Puranjan used to go to a place called Vaishas through this gate with his friend Lubdhaka.
तात्पर्य
यह मलद्वार का संदर्भ है। मलद्वार का स्थान आँखों, नाक और कानों के पश्चिमी भाग में माना गया है। यह द्वार विशेष रूप से मृत्यु के लिए होता है। जब कोई साधरण जीव शरीर को त्यागता है, तो वह मलद्वार से बाहर निकलता है। इसलिए यह कष्टदायी है। जब किसी को प्राकृतिक रूप से मलत्याग करने के लिए कहा जाता है, तो उसे भी दर्द होता है। जीव का दोस्त जो इस द्वार से उसके साथ जाता है उसे लुभ्दक नाम दिया गया है, जिसका अर्थ है "लालच"। हमारे लालच के कारण, हम बिना ज़रूरत ज़्यादा खाते हैं, और इस तरह की लोलुपता मलत्याग के समय दर्द का कारण बनती है। निष्कर्ष यह है कि यदि जीव ठीक से मलत्याग करता है तो उसे अच्छा महसूस होता है। इस द्वार को निऋति या दर्दनाक द्वार के रूप में जाना जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)