श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  4.25.52 
आसुरी नाम पश्चाद् द्वास्तया याति पुरञ्जन: ।
ग्रामकं नाम विषयं दुर्मदेन समन्वित: ॥ ५२ ॥
 
 
अनुवाद
पश्चिम की दिशा में आसुरी नाम का एक प्रवेश द्वार था, जहाँ से राजा पुरञ्जन अपने मित्र दुर्मद के साथ ग्रामक नामक शहर के लिए जाया करते थे।
 
In the west there was a gate called Asuri, through which King Puranjan used to go to a city called Gramak along with his friend Durmad.
तात्पर्य
आसुरी द्वार: भोग-लिप्सा वालों का प्रवेश द्वार

पश्चिमी दिशा का द्वार आसुरी कहलाता था क्योंकि यह विशेष रूप से असुरों के लिए था। असुर शब्द उन लोगों को संदर्भित करता है जो इंद्रिय-तृप्ति में विशेष रूप से यौन जीवन में रूचि रखते हैं, जिसके वे बहुत आकर्षित होते हैं। इस प्रकार, आत्मा, पुरंजना, अपने जननांगों के माध्यम से अपने सबसे बड़े संतुष्टि का आनंद लेता है। परिणामस्वरूप वह ग्रामक नामक स्थान पर जाया करता था। भौतिक इंद्रिय-तृप्ति को ग्राम्य भी कहा जाता है, और वह स्थान जहां यौन जीवन को बहुत हद तक किया जाता है, ग्रामक कहलाता है। ग्रामक जाते समय, पुरंजना के साथ उनके मित्र दुर्मादा भी होते थे। विषय शब्द जीवन की चार शारीरिक आवश्यकताओं को संदर्भित करता है - भोजन, नींद, संभोग और रक्षा। दुर्मादन शब्द का इस तरह विश्लेषण किया जा सकता है: दुर् का अर्थ है दुष्टा, या "पापी," और मद का अर्थ है "पागलपन।" प्रत्येक जीव जो भौतिक प्रकृति के संपर्क में है, उसे मद, या पागल कहा जाता है। यह कहा जाता है:

पिशाची पाईले येना मति-छन्ना हय

माया-ग्रस्ता जीवेरा हय से भाव उदय

(प्रेम-विवर्त)

जब कोई व्यक्ति प्रेतबाधा से ग्रस्त होता है, तो वह व्यावहारिक रूप से पागल हो जाता है। जब कोई पागल हो जाता है, तो वह सभी प्रकार की बकवास करता है। इस प्रकार इंद्रिय-तृप्ति में लिप्त होने के लिए, किसी को एक ऐसे मित्र को स्वीकार करना होगा जो दुर्माद, या भौतिक बीमारी से बुरी तरह प्रभावित हो।

आसुरी नाम पश्चाद् द्वाह शब्द किसी दूसरे अर्थ में महत्वपूर्ण हैं। सूर्योदय सबसे पहले पूर्व दिशा से - बंगाल की खाड़ी - से दिखाई देता है और धीरे-धीरे पश्चिम की ओर बढ़ता है। यह व्यावहारिक रूप से अनुभव किया जाता है कि पश्चिम में लोग इंद्रिय-तृप्ति के अधिक आदी होते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं प्रमाणित किया है, पश्चिमेरा लोका सबा मूढ़ा अनचारा (चैतन्य चरितामृत आदी 10.89): जितना अधिक कोई पश्चिमी दिशा में जाता है, उतना ही अधिक वह लोगों को आध्यात्मिक जीवन में निरस दिखाई देगा। वह उन्हें वैदिक मानकों के विरुद्ध व्यवहार करते हुए पाएगा। इस वजह से, पश्चिम में रहने वाले लोग इंद्रिय-तृप्ति के अधिक आदी होते हैं। इस भागवतम में यह पुष्टि की गई है: आसुरी नाम पश्चाद् द्वाह। दूसरे शब्दों में, पश्चिमी दिशा की जनसंख्या आसुरी सभ्यता, यानी भौतिकवादी जीवन शैली में रुचि रखती है। भगवान चैतन्य ने इसके कारण इस कृष्ण भावनामृत आंदोलन को दुनिया के पश्चिमी हिस्से में प्रचार करना चाहा ताकि इंद्रिय-तृप्ति के आदी लोग उनकी शिक्षाओं से लाभान्वित हो सकें।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)