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श्लोक 4.25.52  |
आसुरी नाम पश्चाद् द्वास्तया याति पुरञ्जन: ।
ग्रामकं नाम विषयं दुर्मदेन समन्वित: ॥ ५२ ॥ |
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| अनुवाद |
| पश्चिम की दिशा में आसुरी नाम का एक प्रवेश द्वार था, जहाँ से राजा पुरञ्जन अपने मित्र दुर्मद के साथ ग्रामक नामक शहर के लिए जाया करते थे। |
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| पश्चिम की दिशा में आसुरी नाम का एक प्रवेश द्वार था, जहाँ से राजा पुरञ्जन अपने मित्र दुर्मद के साथ ग्रामक नामक शहर के लिए जाया करते थे। |
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