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श्लोक 4.25.49  |
मुख्या नाम पुरस्ताद् द्वास्तयापणबहूदनौ ।
विषयौ याति पुरराड्रसज्ञविपणान्वित: ॥ ४९ ॥ |
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| अनुवाद |
| पूर्व दिशा में स्थित पाँचवाँ द्वार मुख्या, यानि प्रधान द्वार कहलाता था। इस द्वार से वह रसज्ञ और विपण नामक दो मित्रों के साथ बहूदन और आपण नामक स्थानों पर जाता था। |
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| पूर्व दिशा में स्थित पाँचवाँ द्वार मुख्या, यानि प्रधान द्वार कहलाता था। इस द्वार से वह रसज्ञ और विपण नामक दो मित्रों के साथ बहूदन और आपण नामक स्थानों पर जाता था। |
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