श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  4.25.48 
नलिनी नालिनी च प्राग्द्वारावेकत्र निर्मिते ।
अवधूतसखस्ताभ्यां विषयं याति सौरभम् ॥ ४८ ॥
 
 
अनुवाद
ठीक इसी प्रकार पूर्व दिशा में भी नलिनी और नालिनी नामक दो द्वार थे, और इन्हें भी एक ही स्थान पर बनाया गया था। इन द्वारों से राजा, अपने मित्र अवधूत के साथ, सौरभ नगर जाया करते थे।
 
Similarly, in the east there were two (other) gates named Nalini and Nalini and these were also built at one place. The king used to go to Saurabh Nagar with his friend Avdhoot through these gates.
तात्पर्य
नलिनी और नालिनी नामक दो द्वार दो नासिका छिद्र हैं। जीव इन दोनों द्वारों का भोग विभिन्न अवधूतों या वायु के सहारे करता है, जो श्वास लेने की प्रक्रिया का निर्माण करते हैं। इन द्वारों के माध्यम से जीव सौरभ या सुगंधित नगर में जाता है। दूसरे शब्दों में, नासिका छिद्र अपने मित्र वायु की सहायता से भौतिक संसार में विभिन्न प्रकार की सुगंधों का आनंद लेते हैं। नलिनी और नालिनी नासिका छिद्रों की पाइप हैं, जिसके माध्यम से व्यक्ति साँस लेता है और साँस छोड़ता है, इंद्रिय सुख की सुगंध का आनंद लेता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)