श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  4.25.46 
पञ्च द्वारस्तु पौरस्त्या दक्षिणैका तथोत्तरा ।
पश्चिमे द्वे अमूषां ते नामानि नृप वर्णये ॥ ४६ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन्, नौ द्वारों में से पाँच द्वार पूर्व की ओर, एक द्वार उत्तर की ओर, एक द्वार दक्षिण की ओर तथा दो द्वार पश्चिम की ओर जाते थे। अब मैं इन विभिन्न द्वारों के नाम बताऊँगा।
 
O King, of the nine gates, five led to the east, one to the north and one to the south, and two led to the west. I shall now try to name these various gates.
तात्पर्य
सतह पर सात द्वार होते हैं -- अर्थात दो आँखें, दो कान, दो नथुने और एक मुँह -- पाँच आगे की ओर देखते हैं, और इनका वर्णन पूर्व की ओर देखने वाले द्वारों के रूप में किया गया है। चूँकि आगे की ओर देखने का अर्थ सूर्य को देखना है, इनका वर्णन पूर्वी द्वार के रूप में किया गया है, क्योंकि सूर्य पूर्व में उदय होता है। उत्तरी दिशा का द्वार और दक्षिणी दिशा का द्वार दो कानों का प्रतिनिधित्व करता है, और पश्चिमी दिशा की ओर देखने वाले दो द्वार मलाशय और गुप्तांगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सभी दरवाजों और द्वारों का वर्णन नीचे दिया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)