श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  4.25.45 
सप्तोपरि कृता द्वार: पुरस्तस्यास्तु द्वे अध: ।
पृथग्विषयगत्यर्थं तस्यां य: कश्चनेश्वर: ॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
उस शहर के नौ द्वारों में से सात भूतल पर थे और दो भूमिगत थे। कुल नौ द्वारों का निर्माण किया गया था और ये नौ द्वार अलग-अलग स्थानों की ओर ले जाते थे। इन सभी द्वारों का उपयोग शहर के अधीक्षक द्वारा किया जाता था।
 
Of the nine gates of that city, seven were on the ground and two were underground. A total of nine gates were built and these nine gates led to different places. All these gates were used by the superintendent of that city.
तात्पर्य
शरीर के जो सात ऊपर की ओर हैं, वो हैं दो आँखें, दो नथुने, दो कान और एक मुँह। दो भूमिगत द्वार गुदा और गुप्ताँग हैं। शरीर का राजा या शासक, जो कि सजीव प्राणी है, इन सभी द्वारों का उपयोग विभिन्न प्रकार के भौतिक सुखों का आनंद लेने के लिए करता है। अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग द्वार खोलने की प्रणाली अभी भी पुराने भारतीय शहरों में स्पष्ट है। पहले एक राजधानी को दीवारों से घेरा जाता था, और विभिन्न शहरों या विशिष्ट दिशाओं में जाने के लिए विभिन्न द्वारों से होकर गुजरना पड़ता था। पुरानी दिल्ली में अभी भी चारदीवारी और विभिन्न द्वारों के अवशेष हैं जिन्हें कश्मीरी गेट, लाहौरी गेट इत्यादि के रूप में जाना जाता है। इसी तरह, अहमदाबाद में एक दिल्ली गेट है। इस उपमा का लक्ष्य यह है कि जीवित प्राणी विभिन्न प्रकार के भौतिक वैभव का आनंद लेना चाहता है, और इस उद्देश्य के लिए प्रकृति ने उसे उसके शरीर में विभिन्न छिद्र दिए हैं जिनका उपयोग वह इंद्रिय सुख के लिए कर सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)