श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  4.25.43 
नारद उवाच
इति तौ दम्पती तत्र समुद्य समयं मिथ: ।
तां प्रविश्य पुरीं राजन्मुमुदाते शतं समा: ॥ ४३ ॥
 
 
अनुवाद
तब नारद मुनि ने आगे कहा: हे राजन! वे दोनों स्त्री और पुरुष, एक-दूसरे के प्रति आपसी समझदारी के सहारे, उस नगरी में दाखिल हुए और उन्होंने एक सौ वर्षों तक जीवन का आनंद लिया।
 
The sage Narada further said: O King, both of them—the man and the woman—entered that city supporting each other with mutual cordiality and enjoyed life for one hundred years.
तात्पर्य
इस संबंध में सौ साल महत्त्वपूर्ण है क्योंकि प्रत्येक मनुष्य को सौ साल तक जीने की रियायत दी गई है। ग्रहों पर सूर्य से दूरी के अनुसार वहाँ जीवन काल भिन्न-भिन्न होता है। दूसरे शब्दों में, इस ग्रह पर सौ साल किसी दूसरे ग्रह पर सौ साल से भिन्न है। ब्रह्मलोक ग्रह के समय के अनुसार भगवान ब्रह्मा सौ साल तक रहते हैं, परन्तु ब्रह्मा का एक दिन इस ग्रह के लाखों वर्षों के बराबर है। इसी तरह, स्वर्गलोक के दिन इस ग्रह के छह महीनों के बराबर होते हैं। यद्यपि, प्रत्येक ग्रह पर एक मानव प्राणी का जीवन काल लगभग सौ साल होता है। भिन्न-भिन्न ग्रहों पर जीवन काल के अनुसार, जीवन स्तर भी भिन्न-भिन्न होते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)