श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  4.25.40 
पितृदेवर्षिमर्त्यानां भूतानामात्मनश्च ह ।
क्षेम्यं वदन्ति शरणं भवेऽस्मिन् यद्गृहाश्रम: ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
उस स्त्री ने आगे कहा : अधिकारियों के अनुसार गृहस्थ जीवन न केवल अपने को बल्कि सभी पूर्वजों, देवताओं, ऋषियों, साधु-पुरुषों और अन्य सभी को अच्छा लगता है। इस प्रकार गृहस्थ जीवन अत्यंत उपयोगी है।
 
The woman continued: According to the authorities, the family life is not only liked by oneself but also by all the ancestors, gods, sages, saints and everyone else. Thus the family life is very useful.
तात्पर्य
वैदिक प्रणाली के अनुसार जब कोई इस भौतिक संसार में जन्म लेता है तब उसके बहुत से दायित्व होते हैं। उस का देवताओं के लिए दायित्व है - सूर्य और चंद्रमा के देवता, राजा इंद्र, वरुण इत्यादि - क्योंकि वे जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति कर रहे हैं। हमें देवताओं की कृपा से ही गर्मी, रोशनी, पानी और सभी अन्य प्राकृतिक सुविधाएँ प्राप्त होती हैं। हम अपने पूर्वजों के भी ऋणी हैं, जिन्होंने हमें ये शरीर, पैतृक संपत्ति, बुद्धि, समाज, दोस्ती और प्यार दिया है। ठीक इसी तरह, हम आम जन के राजनीति और समाजशास्त्र के लिए ऋणी हैं और हम घोड़े, गौ, गधा, कुत्ता और बिल्ली जैसे निम्न श्रेणी के जानवरों के भी ऋणी हैं। इस प्रकार, जैसे ही कोई इस भौतिक संसार में मनुष्य के रूप में जन्म लेता है, उसके बहुत से दायित्व हो जाते हैं और वह इन सभी दायित्वों को चुकाने के लिए बाध्य होता है। यदि वह उन्हें नहीं चुकाता है, तो वह जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया में और अधिक उलझ जाता है। हालाँकि, गृहमेधी, जो भौतिक चीजों का अत्यधिक आदी है, ये नहीं जानता है कि यदि वह केवल मुकुंद के चरण-कमलों में आश्रय ले लेता है, तो वह तुरंत दूसरों के सभी दायित्वों से मुक्त हो जाता है। दुर्भाग्य से एक गृहमेधी को कृष्ण चेतना में कोई रुचि नहीं होती है। प्रहलाद महाराज कहते हैं:

मति न कृष्णे परतः स्वतो वा

मिथोऽभिपद्येत गृहव्रतानाम्

(भाग। 7.5.30)

एक गृह-व्रत एक गृहमेधी के समान ही है। जो कामुक जीवन को सर्वोत्ताम मानता है, वह कृष्ण चेतना में की जाने वाली क्रियाओं को भ्रामक पाता है। या तो अपने निजी विचार के कारण या दूसरों के निर्देश प्राप्त करने या उनसे सलाह करने के कारण, वह कामुक भोग में लिप्त हो जाता है और कृष्ण चेतना में कार्य नहीं कर पाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)