मति न कृष्णे परतः स्वतो वा
मिथोऽभिपद्येत गृहव्रतानाम्
(भाग। 7.5.30)
एक गृह-व्रत एक गृहमेधी के समान ही है। जो कामुक जीवन को सर्वोत्ताम मानता है, वह कृष्ण चेतना में की जाने वाली क्रियाओं को भ्रामक पाता है। या तो अपने निजी विचार के कारण या दूसरों के निर्देश प्राप्त करने या उनसे सलाह करने के कारण, वह कामुक भोग में लिप्त हो जाता है और कृष्ण चेतना में कार्य नहीं कर पाता है।
