श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  4.25.35 
एते सखाय: सख्यो मे नरा नार्यश्च मानद ।
सुप्तायां मयि जागर्ति नागोऽयं पालयन् पुरीम् ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
हे भद्र पुरुष, मेरे साथ ये सभी पुरुष और स्त्रियाँ मेरे मित्र हैं और यह साँप हमेशा जागता रहता है और मेरे सोते समय भी इस शहर की रक्षा करता है। मैं बस इतना ही जानती हूँ, इससे परे मुझे कुछ नहीं पता।
 
O noble soul, all these men and women who are with me are my friends and this snake is always awake and protects this city even when I am asleep. This is all I know and I know nothing beyond this.
तात्पर्य
पूरंजना ने महिला से उन ग्यारह पुरुषों और उनकी पत्नियों और सर्प के बारे में पूछताछ की। महिला ने उनका एक संक्षिप्त विवरण दिया। वह स्पष्ट रूप से अपने आस-पास के पुरुषों और महिलाओं और सर्प के बारे में पूर्ण जानकारी के बिना थी। जैसा कि पहले कहा गया है, सर्प जीवित प्राणी की महत्वपूर्ण शक्ति है। यह महत्वपूर्ण ताकत हमेशा जागृत रहती है, भले ही शरीर और इंद्रियां थक जाती हैं और कोई काम नहीं करती हैं। बेहोशी की स्थिति में भी, जब हम सोते हैं, सर्प, या जीवन शक्ति, बरकरार रहता है और जागृत रहता है। नतीजतन जब हम सोते हैं तो हम सपने देखते हैं। जब जीव अपनी इस भौतिक देह को त्याग देता है, तब भी महत्वपूर्ण शक्ति अक्षुण्ण रहती है और उसे दूसरी भौतिक देह में ले जाया जाता है। इसे संक्रमण कहा जाता है, या शरीर का परिवर्तन, और हम इस प्रक्रिया को मृत्यु के रूप में जानते हैं। वास्तव में, मृत्यु जैसी कोई चीज़ नहीं होती। महत्वपूर्ण शक्ति हमेशा आत्मा के साथ मौजूद रहती है, और जब आत्मा तथाकथित नींद से जागती है, तो वह अपने ग्यारह दोस्तों , या सक्रिय इंद्रियों और अपनी विभिन्न इच्छाओं (पत्नियों) के साथ मन को देख सकता है। महत्वपूर्ण जीवन शक्ति बनी रहती है। हमारे सोने के घंटों के दौरान भी हम अपनी श्वास प्रक्रिया के आधार पर समझ सकते हैं कि साँप इस शरीर के भीतर से गुजरने वाली हवा को खाकर जीवित रहता है। हवा श्वास के रूप में प्रदर्शित होती है, और जब तक साँस होती है, तब तक यह समझा जा सकता है कि सोने वाला व्यक्ति जीवित है। जब स्थूल शरीर सो जाता है तब भी महत्वपूर्ण शक्ति शरीर की रक्षा के लिए सक्रिय और जीवित रहती है। इस प्रकार सर्प को शरीर को जीवन के लायक रखने के लिए हवा खाने और रहने के रूप में वर्णित किया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)