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श्लोक 4.25.34  |
इहाद्य सन्तमात्मानं विदाम न तत: परम् ।
येनेयं निर्मिता वीर पुरी शरणमात्मन: ॥ ३४ ॥ |
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| अनुवाद |
| वीर पुरुष, हम इतना ही जानते हैं कि हम इस जगह में हैं। हम नहीं जानते कि आगे क्या होगा। सच तो यह है कि हम इतने मूर्ख हैं कि यह समझने का प्रयास भी नहीं करते कि हमारे रहने के लिए इस खूबसूरत जगह को किसने बनाया है? |
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| वीर पुरुष, हम इतना ही जानते हैं कि हम इस जगह में हैं। हम नहीं जानते कि आगे क्या होगा। सच तो यह है कि हम इतने मूर्ख हैं कि यह समझने का प्रयास भी नहीं करते कि हमारे रहने के लिए इस खूबसूरत जगह को किसने बनाया है? |
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