श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  4.25.34 
इहाद्य सन्तमात्मानं विदाम न तत: परम् ।
येनेयं निर्मिता वीर पुरी शरणमात्मन: ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
वीर पुरुष, हम इतना ही जानते हैं कि हम इस जगह में हैं। हम नहीं जानते कि आगे क्या होगा। सच तो यह है कि हम इतने मूर्ख हैं कि यह समझने का प्रयास भी नहीं करते कि हमारे रहने के लिए इस खूबसूरत जगह को किसने बनाया है?
 
वीर पुरुष, हम इतना ही जानते हैं कि हम इस जगह में हैं। हम नहीं जानते कि आगे क्या होगा। सच तो यह है कि हम इतने मूर्ख हैं कि यह समझने का प्रयास भी नहीं करते कि हमारे रहने के लिए इस खूबसूरत जगह को किसने बनाया है?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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