श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.25.33 
न विदाम वयं सम्यक्‍कर्तारं पुरुषर्षभ ।
आत्मनश्च परस्यापि गोत्रं नाम च यत्कृतम् ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
उस युवती ने कहा: हे मनुष्यश्रेष्ठ, मैं नहीं जानती कि मुझे किसने जन्म दिया है। मैं तुम्हें इस बारे में ठीक से नहीं बता सकती। साथ ही, मैं अपने या अपने साथ रहने वालों के गोत्र के नाम भी नहीं जानती।
 
The girl said: O best of men, I do not know who created me. I cannot tell you this with certainty. Neither do I know the names of my or others' gotras.
तात्पर्य
मनुष्य अपने मूल अज्ञान से अनभिज्ञ है। वह नहीं जानता कि यह भौतिक जगत् क्यों बनाया गया था, क्यों अन्य यहां कार्य कर रहे हैं और इस विस्तार का मूल स्रोत क्या है। इन सवालों का उत्तर कोई नहीं जानता और इसे ही अज्ञान कहा जाता है। जीवन की उत्पत्ति पर शोध करके महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कुछ रासायनिक संरचनाओं या सेलुलर संयोजनों का पता लगा रहे हैं, किन्तु वास्तव में इस भौतिक जगत् में जीवन के मूल स्रोत को कोई नहीं जानता। 'ब्रह्म-जिज्ञासा' वाक्यांश का प्रयोग इस भौतिक जगत् में हमारे अस्तित्व के मूल स्रोत को जानने की जिज्ञासा को व्यक्त करने के लिए किया जाता है। कोई भी दार्शनिक, वैज्ञानिक या राजनीतिज्ञ वास्तव में यह नहीं जानता कि हम कहाँ से आए हैं, क्यों हम अस्तित्व के लिए बहुत संघर्ष कर रहे हैं और हम कहाँ जाएँगे। सामान्यत: लोगों का मत है कि हम सब यहाँ आकस्मिक रूप से आए हैं और जैसे ही यह शरीर समाप्त हो जाएगा, हमारी सारी नाटकीय गतिविधियाँ समाप्त हो जाएँगी और हम शून्य हो जाएँगे। ऐसे वैज्ञानिक और दार्शनिक अवैयक्तिकतावादी और शून्यवादी हैं। इस श्लोक में वह लड़की जीवित प्राणी की वास्तविक स्थिति को व्यक्त कर रही है। वह अपने पिता का नाम पुरञ्जन को नहीं बता सकती क्योंकि वह नहीं जानती कि वह कहाँ से आई है। और न ही वह जानती है कि वह उस स्थान पर क्यों मौजूद है। वह साफ साफ कहती है कि वह इस सब के बारे में कुछ नहीं जानती। भौतिक जगत् में जीवित प्राणी की स्थिति यही है। यहाँ बहुत सारे वैज्ञानिक, दार्शनिक और बड़े नेता हैं, लेकिन वे नहीं जानते कि वे कहाँ से आए हैं और न ही यह जानते हैं कि वे इस भौतिक जगत् में तथाकथित सुख की स्थिति प्राप्त करने के लिए क्यों व्यस्त हैं। इस भौतिक जगत् में रहने के लिए हमारे पास बहुत सारी अच्छी सुविधाएँ हैं, लेकिन हम इतने मूर्ख हैं कि हम यह नहीं पूछते कि किसने इस जगत् को हमारे लिए रहने योग्य बनाया है और इसे इतने अच्छे से व्यवस्थित किया है। सब कुछ क्रम से कार्य कर रहा है, किन्तु लोग मूर्खतावश सोचते हैं कि वे इस भौतिक जगत् में आकस्मिक तौर पर पैदा हुए हैं और मृत्यु के बाद वे शून्य हो जाएँगे। वे सोचते हैं कि यह खूबसूरत रहने की जगह अपने आप बनी हुई है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)