प्राचीनबर्हिषं क्षत्त: कर्मस्वासक्तमानसम् ।
नारदोऽध्यात्मतत्त्वज्ञ: कृपालु: प्रत्यबोधयत् ॥ ३ ॥
अनुवाद
जब राजकुमार जल में कठोर तपस्या में लीन थे, तब उनके पिता कई तरह के स्वार्थी कर्मों में लगे हुए थे। उसी समय सभी आध्यात्मिक जीवन के ज्ञाता और शिक्षक महान संत नारद, राजा पर बहुत दयालु हुए और उन्हें आध्यात्मिक जीवन के बारे में उपदेश देने का फैसला किया।
While the prince was performing severe penance under water, his father was busy performing various types of Sakaam Karma. At that time, the Supreme Saint Narada, the knower and teacher of all spiritual life, took great pity on the king and decided to give him advice on spiritual life.
तात्पर्य
जैसा कि भगवान चैतन्य के महान भक्त, प्रबोधानंद सरस्वती ठाकुर ने उद्धृत किया है, कैवल्य या ब्राह्मण तेज में विलीन होना, नरक में जाने जैसा है। उन्होंने समान रूप से यह भी कहा कि स्वर्गीय जीवन के भोग के लिए ऊपरी ग्रह प्रणालियों में जाना केवल प्लूरिसमैगोरिया है। इसका अर्थ यह हुआ कि एक भक्त, कर्मियों और ज्ञानियों के परम लक्ष्य को कोई महत्व नहीं देता है। कर्मियों का अंतिम लक्ष्य स्वर्गीय साम्राज्य में पदोन्नति है, और ज्ञानियों का अंतिम लक्ष्य ब्राह्मण तेज में विलीन होना है। बेशक, ज्ञानी कर्मियों से श्रेष्ठ होते हैं, जैसा कि भगवान चैतन्य द्वारा निश्चित किया गया है। कोटि-करमनिष्ठ-मध्ये एक 'ज्ञान' श्रेष्ठ: "कई हजारों फलदायी अभिनेताओं में से एक ज्ञानी या अवैयक्तिक व्यक्ति श्रेष्ठ है।" (सीसी मध्य 19.147) इसलिए, एक भक्त कर्म के मार्ग पर या फल देने वाली गतिविधियों के द्वारा ऊँचाई पर जाने के लिए कभी नहीं जाता है। किंग प्राचीनबरहिषत पर नारद मुनि ने दया प्रकट की, जब उन्होंने देखा कि राजा फलदायी गतिविधियों में व्यस्त है। सांसारिक श्रमिकों की तुलना में, जो यज्ञों को करके उच्च ग्रह प्रणालियों में ऊपर उठने की कोशिश कर रहे हैं, निस्संदेह श्रेष्ठ हैं। हालाँकि, विशुद्ध भक्ति सेवा में, कर्म और ज्ञान दोनों को मायावी ऊर्जा की विलक्षण विशेषता माना जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥