क एतेऽनुपथा ये त एकादश महाभटा: ।
एता वा ललना: सुभ्रु कोऽयं तेऽहि: पुर:सर: ॥ २७ ॥
अनुवाद
हे कमलनयनी, तुम्हारे साथ ये ग्यारह ताकतवर अंगरक्षक, ये दस खास नौकर, इन दस नौकरों के पीछे-पीछे चल रही ये औरतें, और तुम्हारे आगे-आगे ये सर्प कौन हैं?
O Kamalanayani, who are the eleven strong bodyguards and these ten special servants accompanying you? Who are these women following these ten servants and who is this serpent walking in front of you?
तात्पर्य
मन के दस बलशाली सेवक पाँच कर्म इन्द्रियाँ और पाँच ज्ञान इन्द्रियाँ हैं। ये सभी दस इन्द्रियाँ मन के तत्वावधान में काम करती हैं। मन और दस इन्द्रियाँ मिलकर ग्यारह प्रबल अंगरक्षक बन जाते हैं। इन्द्रियों के अधिकार क्षेत्र में आने वाली सैकड़ों स्त्रियों को यहाँ ललनाः के रूप में संबोधित किया गया है। मन बुद्धि के अधीन कार्य करता है, और मन के अधीन दस इन्द्रियाँ होती हैं, और दस इन्द्रियों के अधीन अनगिनत इच्छाएँ होती हैं जिन्हें पूरा किया जाना है। हालाँकि, ये सभी उस प्राण शक्ति पर निर्भर करते हैं, जिसे यहाँ साँप द्वारा दर्शाया गया है। जब तक प्राण शक्ति वहाँ है, तब तक मन काम करता है, और मन के अधीन इन्द्रियाँ काम करती हैं, और इन्द्रियाँ बहुत सारी भौतिक इच्छाओं को जन्म देती हैं। वास्तव में जीव जिसे पुरंजना के रूप में जाना जाता है, इतने अधिक उपकरणों से शर्मिंदा होता है। यह सारा साजो सामान केवल चिंता के विभिन्न स्रोतों का निर्माण करता है, लेकिन जो सर्वोच्च भगवान के प्रति समर्पित है, और जो सारा काम उन्हीं पर छोड़ देता है, वह ऐसी चिंताओं से मुक्त हो जाता है। इसलिए प्रह्लाद महाराज उस व्यक्ति को सलाह देते हैं जिसने भौतिकवादी जीवन शैली अपनाई है, जो कभी स्थायी नहीं होती बल्कि हमेशा अस्थायी होती है, सर्वोच्च भगवान की शरण लेने के लिए और अपनी सभी तथाकथित जिम्मेदारियों को छोड़ने के लिए सभी चिंताओं से मुक्त हो जाते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥