का त्वं कञ्जपलाशाक्षि कस्यासीह कुत: सति ।
इमामुप पुरीं भीरु किं चिकीर्षसि शंस मे ॥ २६ ॥
अनुवाद
हे कमल के समान सुन्दर आँखों वाली, कृपया मुझे यह बताओ कि तुम कहाँ से आ रही हो, तुम कौन हो और तुम किसकी बेटी हो? तुम अत्यंत पवित्र लगती हो। यहाँ आने का तुम्हारा उद्देश्य क्या है? तुम क्या करना चाह रही हो? कृपया मुझे इन सभी बातों को बताओ।
O Kamalanayani, please tell me where you are coming from, who you are and whose daughter you are? You look very pious. What is your purpose of coming here? What do you want to do? Please tell me all these things.
तात्पर्य
वेदान्त-सूत्र में प्रथम सूत्र 'अथातो ब्रह्म-जिज्ञासा' है। मानव जीवन में व्यक्ति को स्वयं से और स्वयं के बुद्धि से अनेक प्रश्न पूछने चाहिए। मानव जीवन से निम्न जीवन रूपों में बुद्धि जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं से आगे नहीं जाती है, जैसे कि भोजन करना, सोना, संभोग करना और आत्मरक्षा करना। कुत्ते, बिल्ली और बाघ हमेशा ही भोजन प्राप्त करने, सोने के स्थान की तलाश करने, आत्मरक्षा करने या संभोग में सफल होने की कोशिश में लगे रहते हैं। हालाँकि, मानव जीवन में व्यक्ति को यह पूछने के लिए पर्याप्त बुद्धिमान होना चाहिए कि वह क्या है, क्यों वह संसार में आया है, उसका कर्तव्य क्या है, सर्वोच्च नियंत्रक कौन है, जड़ पदार्थ और चेतन जीव में क्या अंतर है, आदि। अनेक प्रश्न पूछे जाने चाहिए और वास्तव में बुद्धिमान व्यक्ति को प्रत्येक वस्तु के सर्वोच्च स्रोत के बारे में पूछताछ करनी चाहिए: अथातो ब्रह्म-जिज्ञासा। एक चेतन जीव हमेशा निश्चित मात्रा में बुद्धि से जुड़ा होता है, किंतु मानव जीवन में चेतन जीव को अपनी आध्यात्मिक पहचान के बारे में पूछताछ करनी चाहिए। यही वास्तविक मानवीय बुद्धि है। यह कहा गया है कि शरीर के प्रति सचेत व्यक्ति मानव रूप में होने पर भी पशु से बेहतर नहीं है। भगवद-गीता (15.15) में श्री कृष्ण कहते हैं, सर्वस्य चाऽहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर् ज्ञानम अपोहनं च: "मैं प्रत्येक के हृदय में विराजमान हूँ और मुझसे ही स्मरण, ज्ञान और विस्मृति आती है।" पशु रूप में चेतन जीव भगवान के साथ अपने संबंध को पूरी तरह से भूल जाता है। इसे अपोहनम्, अर्थात विस्मृति कहते हैं। हालाँकि, मानव जीवन में चेतना अधिक विकसित होती है और परिणामस्वरूप मानव को भगवान के साथ अपने संबंध को समझने का अवसर मिलता है। मानव रूप में, व्यक्ति को पुराणजन की तरह ये सभी प्रश्न पूछकर अपनी बुद्धि का उपयोग करना चाहिए, जहाँ चेतन जीव अज्ञात कन्या से पूछ रहा है कि वह कहाँ से आई है, उसका क्या व्यवसाय है, वह क्यों उपस्थित है, आदि। ये आत्म-तत्व अर्थात आत्म साक्षात्कार के बारे में प्रश्न हैं। निष्कर्ष यह है कि जब तक कोई चेतन जीव आत्म साक्षात्कार के बारे में जिज्ञासु नहीं होता है, वह पशु से अलग नहीं है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥