श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  4.25.21 
पञ्चशीर्षाहिना गुप्तां प्रतीहारेण सर्वत: ।
अन्वेषमाणामृषभमप्रौढां कामरूपिणीम् ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
वह स्त्री एक पाँच फनों वाले सर्प द्वारा चारों ओर से सुरक्षित थी। वह बेहद खूबसूरत और जवान थी और एक उचित पति को खोजने के लिए काफी उत्सुक नजर आ रही थी।
 
The woman was protected on all sides by a serpent with five hoods. She was very beautiful and young and seemed very anxious to find a suitable husband.
तात्पर्य
किसी जीव-शक्ति में कार्यरत पाँच प्रकार की वायु शामिल होती है जिसे प्राण, आपान, व्यान, समान और उदान के रूप में जाना जाता है। जीवन-शक्ति की तुलना एक सर्प से की जाती है क्योंकि एक सर्प केवल वायु पीकर जी सकता है। वायु द्वारा ली जाने वाली जीवन-शक्ति को प्रतिहार या अंगरक्षक के रूप में वर्णित किया गया है। जीवन-शक्ति के बिना कोई भी एक पल भी जीवित नहीं रह सकता है। दरअसल, सभी इंद्रियाँ जीवन-शक्ति के संरक्षण में काम कर रही हैं।

बुद्धि का प्रतिनिधित्व करने वाली महिला, एक पति की तलाश में थी। यह दर्शाता है कि बुद्धि चेतना के बिना कार्य नहीं कर सकती है। एक सुंदर महिला तब तक बेकार है जब तक कि उसे उचित पति द्वारा संरक्षित न किया जाए। बुद्धि हमेशा बहुत ताजी होनी चाहिए; इसलिए यहाँ अप्रौढ़ाम्,"बहुत युवा" शब्द का उपयोग किया गया है। भौतिक सुख का अर्थ है रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श के लिए बुद्धि का उपयोग करना।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)