श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  4.25.20 
यद‍ृच्छयागतां तत्र ददर्श प्रमदोत्तमाम् ।
भृत्यैर्दशभिरायान्तीमेकैकशतनायकै: ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
उस अद्भुत उद्यान में भ्रमण करते हुए राजा पुरञ्जन की नज़र अचानक एक बेहद खूबसूरत महिला पर पड़ी जो वहाँ बेफिक्री से टहल रही थी। उसके साथ दस नौकर थे और हर नौकर के साथ सैकड़ों पत्नियाँ थीं।
 
While strolling in that wonderful garden, King Purañjana suddenly saw a beautiful woman approaching at once. She was accompanied by ten servants, and each servant had hundreds of wives.
तात्पर्य
मानव शरीर की तुलना एक सुंदर बाग से की गई है। युवावस्था के दौरान यौन भावना जाग्रत होती है और बुद्धि, व्यक्ति की कल्पना के अनुसार, विपरीत लिंग से संपर्क करना चाहती है। युवावस्था में एक पुरुष या महिला सीधे तौर पर न भी हो तो बुद्धि या कल्पना द्वारा विपरीत लिंग की तलाश में रहता है। बुद्धि मन को प्रभावित करती है और मन दस इंद्रियों को नियंत्रित करता है। इनमें से पांच इंद्रियां ज्ञान एकत्र करती हैं और पांच सीधे काम करती हैं। प्रत्येक इंद्रिय की कई इच्छाएं होती हैं जिन्हें पूरा करना होता है। यह शरीर और शरीर के स्वामी, पुरंजना की स्थिति है, जो शरीर के भीतर है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)