श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  4.25.19 
नानारण्यमृगव्रातैरनाबाधे मुनिव्रतै: ।
आहूतं मन्यते पान्थो यत्र कोकिलकूजितै: ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
ऐसे वातावरण में जंगल के जानवर भी ऋषियों की तरह अहिंसक और ईर्ष्या से रहित हो गए थे। इसलिए, वे किसी पर हमला नहीं करते थे। इन सबसे ऊपर कोयलों की कूक थी। उस रास्ते से गुजरने वाले किसी भी यात्री को मानो उस सुंदर बगीचे में विश्राम करने का निमंत्रण दिया जा रहा हो।
 
In such an environment, the animals of the forest had also become non-violent and jealous like the sages, so they did not attack anyone. Not only this, cuckoos were singing everywhere. It was as if any traveller passing by that way was being invited to rest in that beautiful garden.
तात्पर्य
पत्नी और बच्चों वाला शांत परिवार वन के शांत वातावरण की तुलना में है। बच्चों की तुलना अहिंसक जानवरों से की जाती है। हालाँकि, कभी-कभी पत्नियों और बच्चों को svajanākhya-dasyu, रिश्तेदारों के नाम पर चोर कहा जाता है। एक आदमी कड़ी मेहनत करता है, लेकिन नतीजा यह होता है कि उसकी पत्नी और बच्चे उसे उसी तरह लूटते हैं जिस तरह वन में किसी व्यक्ति पर कुछ चोरों और लुटेरों द्वारा हमला किया जाता है जो उसका पैसा छीन लेते हैं। फिर भी, पारिवारिक जीवन में पत्नी और बच्चों की उथल-पुथल पारिवारिक जीवन के बगीचे में कोयल के कूकने जैसी लगती है। इस तरह के वातावरण से आमंत्रित होकर, जो व्यक्ति ऐसे आनंदमय पारिवारिक जीवन से गुजर रहा है, वह हर कीमत पर अपने परिवार को अपने साथ रखना चाहता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)