हिमनिर्झरविप्रुष्मत्कुसुमाकरवायुना ।
चलत्प्रवालविटपनलिनीतटसम्पदि ॥ १८ ॥
अनुवाद
झरनों से बहता जल हिमाच्छादित पर्वतों से आता था। वसंत की हवा इसे लेकर आती थी। झील के किनारे स्थित पेड़ों की टहनियाँ उस जल से भर जाती थीं।
The branches of the trees standing on the banks of the lake were catching the water droplets carried by the spring breeze from the springs falling from the snow-clad mountains.
तात्पर्य
इस श्लोक में विशेष तौर पर हिम-निर्झर शब्द महत्वपूण है। झरना एक प्रकार के द्रव हास्य या रस (रिश्तों) का प्रतिनिधित्व करता है। शरीर में हास्य, रस अथवा सुखद भावना के विभिन्न प्रकार हैं। श्रेष्ठ सुखद भावना (रिश्ते) को कामुक सुखद भावना (आदि-रस) कहते हैं। जब यह आदि-रस या कामुक इच्छा, कामदेव द्वारा संचालित वसंत की हवा के संपर्क में आता है तो यह आंदोलित हो जाता है। दूसरे शब्दों में, ये सभी रूप, रस, गंध, ध्वनि और स्पर्श के प्रतिरूप हैं। हवा स्पर्श अथवा छूना है; झरना रस अथवा स्वाद है; वसंत की हवा (कुसुमाकर) गंध है। आनन्द की ये सभी किस्में जीवन को बहुत आह्लादकारी बनाती हैं, और इस तरह हम भौतिक अस्तित्व से मोहित हो जाते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥