सभाचत्वररथ्याभिराक्रीडायतनापणै: ।
चैत्यध्वजपताकाभिर्युक्तां विद्रुमवेदिभि: ॥ १६ ॥
अनुवाद
उस नगर में ऐसे अनेक सभाभवन, चौराहे, सड़कें, खान-पान गृह, जुआ घर, बाज़ार, विश्रामालय, झंडे, पताकाएँ और सुंदर पार्क थे, जैसे वह इन सबसे घिरा हुआ हो।
There were many assembly halls, crossroads, roads, eating-houses, gambling-places, markets, rest houses, flags, banners and beautiful gardens in that city. That city was surrounded by all these.
तात्पर्य
इस प्रकार राजधानी का वर्णन किया गया है। राजधानी में सभा-भवन और कई वर्ग, कई चौराहे, मार्ग और सड़कें, कई जुआ घर, बाजार और विश्राम स्थल होते हैं, सभी ध्वज और झालरों से सजे हुए हैं। वर्ग रेलिंग से घिरे हुए हैं और पेड़ों से रहित हैं। शरीर के हृदय की तुलना सभा-भवन से की जा सकती है, क्योंकि जीव हृदय के भीतर परमात्मा के साथ रहता है, और इस प्रकार हृदय सभी स्मरण, विस्मरण और विचार-विमर्श का केंद्र है। जैसा कि भगवद-गीता (15.15) में कहा गया है, सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्ठो मत्तः स्मृतिर् ज्ञानम् अपोहनं च। शरीर में आंखें, कान और नाक इंद्रिय भोग के लिए अलग-अलग आकर्षण स्थल हैं, और इधर-उधर जाने के लिए सड़कों की तुलना शरीर के भीतर बहने वाली विभिन्न प्रकार की हवा से की जा सकती है। शरीर के भीतर की हवा और विभिन्न नसों को नियंत्रित करने की योग प्रक्रिया को सुषुम्ना कहा जाता है, जो मुक्ति का मार्ग है। शरीर भी एक विश्राम स्थल है क्योंकि जब जीव थक जाता है तो वह शरीर के भीतर विश्राम करता है। हथेलियों और पैरों के तलवों की तुलना झंडों और झालरों से की गई है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥