श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.25.15 
नीलस्फटिकवैदूर्यमुक्तामरकतारुणै: ।
क्लृप्तहर्म्यस्थलीं दीप्तां श्रिया भोगवतीमिव ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
उस शहर के घरों की फर्शें नीलम, स्फटिक, हीरे, मोती, पन्ना और लाल से बनी हुई थीं। घरों की रंगत के कारण वह शहर भोगवती नाम के स्वर्गीय नगर जैसा लग रहा था।
 
The floors of the houses of that city were made of sapphire, crystal, diamond, pearl, emerald and ruby. Due to the brilliance of the houses, this city looked like a heavenly city named Bhogavati.
तात्पर्य
शरीर रूपी नगरी में हृदय को राजधानी माना जाता है। जिस प्रकार किसी राज्य की राजधानी विभिन्न ऊंची-ऊंची इमारतों और चमकते-दमकते महलों से विशेष रूप से भरी होती है, उसी प्रकार शरीर का हृदय भी भौतिक सुखों की विभिन्न इच्छाओं और योजनाओं से भरा होता है। ऐसी योजनाओं की तुलना कभी-कभी नीलम, माणिक, मोती और पन्ना जैसे मूल्यवान रत्नों से की जाती है। हृदय भौतिक सुखों की योजना बनाने का केंद्र बन जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)