श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  4.25.14 
प्राकारोपवनाट्टालपरिखैरक्षतोरणै: ।
स्वर्णरौप्यायसै: श‍ृङ्गै: सङ्कुलां सर्वतो गृहै: ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
वह नगर चारों ओर दीवारों और बगीचों से घिरा हुआ था, और उसके भीतर गुम्बद और मीनारें, नहरें, खिड़कियाँ और झरोखे थे। वहाँ के घर सोने, चाँदी और लोहे से बने गुम्बदों से सजे हुए थे।
 
That city was surrounded by walls and gardens on all sides and inside it there were minarets, canals, windows and vents. The houses there were decorated with domes made of gold, silver and iron.
तात्पर्य
शरीर त्वचा की दीवारों द्वारा सुरक्षित रहता है। शरीर पर स्थित बालों की तुलना पार्कों से की जाती है और शरीर के सबसे ऊँचे हिस्सों, जैसे नाक और सिर की तुलना टावरों से की जाती है। शरीर के विभिन्न हिस्सों पर मौजूद झुर्रियाँ और गड्ढों की तुलना खाइयों या नहरों से की जाती है, आँखों की तुलना खिड़कियों से की जाती है और पलकों की तुलना सुरक्षात्मक फाटकों से की जाती है। तीन प्रकार की धातुएँ—सोना, चाँदी और लोहा—भौतिक प्रकृति के तीन गुणों का प्रतिनिधित्व करती हैं। सोना अच्छाई का प्रतिनिधित्व करता है; चाँदी, जुनून; और लोहा, अज्ञानता। शरीर को कभी-कभी तीन तत्वों वाला एक थैला भी माना जाता है (त्रि-धातु): बलगम, पित्त और वायु (कफ, पित्त और वायु)। यस्यत्मा-बुद्धिः कुणपे त्रि-धातुके। भागवतम (10.84.13) के अनुसार, जो कोई भी बलगम, पित्त और वायु के इस थैले को स्वयं मानता है, उसे गाय या गधे से बेहतर नहीं माना जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)