भाऱत-भूमिते हइला मनुष्य-जन्म यारा
जन्म सार्थक करि' कर पर-उपकार
(चै.चा. आदि 9.41)
इस प्रकार जो कोई भी भाऱत-वर्ष की भूमि में जन्म लेता है, वह जीवन की सभी सुविधाओं को प्राप्त करता है। वह भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति दोनों के लिए इन सभी सुविधाओं का लाभ उठा सकता है और इस प्रकार अपने जीवन को सफल बना सकता है। जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के बाद, कोई व्यक्ति नैतिक उद्देश्यों के लिए अपने ज्ञान और अनुभव को पूरी दुनिया में वितरित कर सकता है। दूसरे शब्दों में, जो व्यक्ति अपने पिछले धार्मिक कार्यों के कारण भाऱतवर्ष की भूमि में जन्म लेता है, उसे मानव जीवन के रूप को विकसित करने की पूरी सुविधा मिलती है। भारत में, जलवायु की स्थिति ऐसी है कि भौतिक परिस्थितियों से परेशान हुए बिना कोई बहुत शांतिपूर्वक रह सकता है। वास्तव में, महाराज युधिष्ठिर या भगवान रामचंद्र के समय में, लोग सभी चिंताओं से मुक्त थे। अत्यधिक ठंड या अत्यधिक गर्मी भी नहीं थी। तीन प्रकार की दयनीय स्थितियाँ - आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक (शरीर और मन से उत्पन्न कष्ट, अन्य जीवों द्वारा उत्पन्न कष्ट, और प्राकृतिक गड़बड़ी) - भगवान रामचंद्र या महाराज युधिष्ठिर के शासनकाल के दौरान सभी अनुपस्थित थे। लेकिन वर्तमान में, पृथ्वी पर अन्य देशों की तुलना में, भारत कृत्रिम रूप से परेशान है। हालाँकि, ये भौतिक अशांतियाँ होने के बावजूद, देश की संस्कृति ऐसी है कि कोई भी जीवन के लक्ष्य को आसानी से प्राप्त कर सकता है - अर्थात् मुक्ति, या भौतिक बंधन से मुक्ति। इस प्रकार भारत में जन्म लेने के लिए किसी व्यक्ति ने पिछले जीवन में कई धार्मिक कार्य किए होंगे।
इस श्लोक में लक्षिता-लक्षनाम शब्द यह दर्शाता है कि भारत वर्ष में प्राप्त मानव शरीर बहुत शुभ है। वैदिक संस्कृति ज्ञान से परिपूर्ण है और भारत में जन्मा व्यक्ति वैदिक सांस्कृतिक ज्ञान और वर्णाश्रम-धर्म के नाम से प्रसिद्ध सांस्कृतिक प्रणाली का पूरा लाभ ले सकता है। आज भी, जब हम पूरे विश्व में यात्रा करते हैं, हम देखते हैं कि कुछ देशों में मनुष्यों के पास बहुत सारी भौतिक सुविधाएं हैं, लेकिन आध्यात्मिक उन्नति के लिए कोई सुविधा नहीं है। हम हर जगह एक-पक्षीय सुविधाओं के दोष और पूरी सुविधाओं की कमी पाते हैं। एक अंधा आदमी चल सकता है लेकिन देख नहीं सकता है, और एक लंगड़ा आदमी चल नहीं सकता है लेकिन देख सकता है अंध-पंगु-न्याय नामक तर्क का अनुसरण करते हुए, अंधा आदमी लंगड़े आदमी को अपने कंधे पर उठा सकता है, और जैसे ही अंधा आदमी चलता है, लंगड़ा आदमी उसे दिशा-निर्देश दे सकता है। इस प्रकार मिलकर वे चल सकते हैं, लेकिन व्यक्तिगत रूप से न तो अंधा आदमी और न ही लंगड़ा आदमी सफलतापूर्वक चल सकता है। इसी तरह, जीवन का यह मानवीय रूप आध्यात्मिक जीवन की उन्नति और भौतिक आवश्यकताओं को क्रम में रखने के लिए है। विशेष रूप से पश्चिमी देशों में भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए पर्याप्त सुविधाएं हैं, लेकिन आध्यात्मिक उन्नति का कोई विचार नहीं है। कई लोग आध्यात्मिक उन्नति के लिए तरसते हैं, लेकिन कई धोखेबाज आते हैं, उनके पैसे का फायदा उठाते हैं, उन्हें धोखा देते हैं और चले जाते हैं। सौभाग्य से कृष्ण चैतन्य आंदोलन भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति दोनों के लिए सभी सुविधाएं देने के लिए है। इस प्रकार पश्चिमी देशों के लोग इस आंदोलन का लाभ उठा सकते हैं। भारत में गांवों का कोई भी व्यक्ति, जो भारत के औद्योगिक शहरों से अप्रभावित रहता है, आज भी किसी भी हालत में रह सकता है और आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है। शरीर को नौ द्वारों का शहर कहा गया है, और इन नौ द्वारों में दो आंखें, दो कान, दो नथुने, एक मुंह, एक जननांग और एक मलाशय शामिल हैं। जब नौ द्वार साफ होते हैं और ठीक से काम करते हैं, तो यह समझना होगा कि शरीर स्वस्थ है। भारत में, ग्रामीणों द्वारा इन नौ द्वारों को साफ रखा जाता है जो सुबह जल्दी उठते हैं, कुएं या नदियों में स्नान करते हैं, मंगल-आरती में भाग लेने के लिए मंदिर जाते हैं, हरे कृष्ण महा-मंत्र का जाप करते हैं और प्रसाद लेते हैं। इस प्रकार व्यक्ति मानव जीवन की सभी सुविधाओं का लाभ उठा सकता है। हम अपने समाज के पश्चिमी देशों के विभिन्न केंद्रों में धीरे-धीरे यह व्यवस्था शुरू कर रहे हैं। इसका लाभ उठाने वाला आध्यात्मिक जीवन में अधिक से अधिक प्रबुद्ध होता जाता है। इस समय, भारत की तुलना लंगड़े आदमी से और पश्चिमी देशों की तुलना अंधे आदमी से की जा सकती है। पिछले दो हजार वर्षों से भारत विदेशियों के शासन के अधीन रहा है, और प्रगति के पैर टूट चुके हैं। पश्चिमी देशों में भौतिक वैभव की चकाचौंध से लोगों की आंखें अंधी हो गई हैं। पश्चिमी देशों का अंधा व्यक्ति और भारत का लंगड़ा व्यक्ति इस कृष्ण चेतना आंदोलन में मिलकर काम करें। तब भारत का लंगड़ा आदमी पश्चिमी व्यक्ति की मदद से चल सकता है, और अंधा पश्चिमी व्यक्ति लंगड़े आदमी की मदद से देख सकता है। संक्षेप में, पश्चिमी देशों की भौतिक उन्नति और भारत की आध्यात्मिक संपत्ति को पूरे मानव समाज की उन्नति के लिए एक साथ जोड़ना चाहिए।
