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श्लोक 4.25.12  |
न साधु मेने ता: सर्वा भूतले यावती: पुर: ।
कामान् कामयमानोऽसौ तस्य तस्योपपत्तये ॥ १२ ॥ |
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| अनुवाद |
| राजा पुरञ्जन को इन्द्रिय भोगों की ऐसी असीमित लालसा थी कि वह सारे संसार में इसी उद्देश्य को लेकर भटकता रहा कि उसे ऐसी जगह मिल जाए, जहाँ उसकी सारी इच्छाएँ पूरी हो सकें। परंतु उसे सर्वत्र अभाव ही अनुभव हुआ। |
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| राजा पुरञ्जन को इन्द्रिय भोगों की ऐसी असीमित लालसा थी कि वह सारे संसार में इसी उद्देश्य को लेकर भटकता रहा कि उसे ऐसी जगह मिल जाए, जहाँ उसकी सारी इच्छाएँ पूरी हो सकें। परंतु उसे सर्वत्र अभाव ही अनुभव हुआ। |
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