शब्द "ब्रह्च-श्रवाः" भी महत्वपूर्ण है। शब्द "श्रवः" का अर्थ है "प्रसिद्धि"। प्राणी प्राचीन काल से प्रसिद्ध है, जैसा कि भगवद् गीता (2.20) में कहा गया है, "न जायते म्रियते वा": "प्राणी कभी जन्म नहीं लेता और कभी मरता नहीं है"। चूंकि वह अमर है, उसकी गतिविधियां शाश्वत हैं, हालांकि वे विभिन्न प्रकार के शरीरों में की जाती हैं। "न हन्यते हन्यामाने शरीरे": "वह शरीर के विनाश के बाद भी नहीं मरता है"। इस प्रकार, प्राणी एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानांतरित होता रहता है और विभिन्न गतिविधियाँ करता रहता है। प्रत्येक शरीर में प्राणी बहुत सारे कार्य करता है। कभी-कभी वह एक महान नायक बन जाता है - जैसे हिरण्यकश्यप और कंस या आधुनिक युग में, नेपोलियन या हिटलर। निश्चित रूप से ऐसे पुरुषों की गतिविधियाँ बहुत महान होती हैं, लेकिन जैसे ही उनके शरीर समाप्त होते हैं, बाकी सब कुछ समाप्त हो जाता है। फिर वे केवल नाम मात्र के लिए रह जाते हैं। इसलिए एक प्राणी को "ब्रह्च-श्रवाः" कहा जा सकता है; विभिन्न प्रकार की गतिविधियों के लिए उसकी बहुत प्रतिष्ठा हो सकती है। फिर भी, उसका एक दोस्त है जिसे वह नहीं जानता। भौतिकवादी व्यक्ति यह नहीं समझते कि भगवान अतिआत्मा या परमात्मा के रूप में मौजूद हैं, जो प्रत्येक प्राणी के हृदय में स्थित है। यद्यपि परमात्मा जीव के बगल में एक दोस्त के रूप में बैठता है, जीव या प्राणी, यह नहीं जानता। इसलिए उसे "अविज्ञाता-सखा" के रूप में वर्णित किया गया है, जिसका अर्थ है "जिसके पास एक अज्ञात दोस्त है"। शब्द "अविज्ञाता-चेष्टितः" भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एक प्राणी परमात्मा के निर्देशन में कड़ी मेहनत करता है और प्रकृति के नियमों द्वारा दूर ले जाया जाता है। फिर भी, वह खुद को भगवान से स्वतंत्र और भौतिक प्रकृति के कड़े कानूनों से स्वतंत्र समझता है। भगवद गीता (2.24) में कहा गया है:
"अच्छेद्योऽयं अदाह्योऽयं
अक्लेद्योऽशोष्य एव च
नित्यः सर्व-गतः स्थारु
अचलोऽयं सनातनः"
"यह व्यक्तिगत आत्मा अटूट और अघुलनशील है और इसे न तो जलाया जा सकता है और न ही सुखाया जा सकता है। वह चिरस्थायी, सर्व-व्यापी, अपरिवर्तनीय, अचल और शाश्वत रूप से समान है।"
जीव "सनातन" या शाश्वत है। चूंकि उसे किसी भी हथियार से नहीं मारा जा सकता है, आग से जलाकर राख नहीं किया जा सकता है, पानी से भीगा या नम नहीं किया जा सकता है, और न ही हवा से सुखाया जा सकता है, इसलिए उसे भौतिक प्रतिक्रियाओं से प्रतिरक्षित माना जाता है। यद्यपि वह शरीर बदल रहा है, लेकिन वह भौतिक परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता है। उसे भौतिक परिस्थितियों में रखा गया है, और वह अपने मित्र, सुपरसोल के निर्देशों के अनुसार कार्य करता है। जैसा कि भगवद गीता (15.15) में कहा गया है:
"सर्वस्य चाऽहं हृदि संनिविष्टो
मत्तः स्मृतिर् ज्ञानम पोहनं च"
"मैं सभी के हृदय में बैठा हूँ, और मुझसे ही स्मरण, ज्ञान और विस्मरण आता है।" इस प्रकार, परमात्मा के रूप में भगवान सभी के हृदय में स्थित हैं, और वह प्राणी को वैसे ही कार्य करने के लिए निर्देश देता है जैसे प्राणी चाहता है। इस जीवन और अपने पिछले जन्मों में जीव नहीं जानता कि भगवान उसे सभी प्रकार की इच्छाओं को पूरा करने का मौका दे रहा है। प्रभु की अनुमति के बिना कोई भी इच्छा पूरी नहीं कर सकता। प्रभु द्वारा दी गई सभी सुविधाएँ बद्ध आत्मा के लिए अज्ञात होती हैं।
