श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  4.25.1 
मैत्रेय उवाच
इति सन्दिश्य भगवान् बार्हिषदैरभिपूजित: ।
पश्यतां राजपुत्राणां तत्रैवान्तर्दधे हर: ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
महर्षि मैत्रेय ने विदुर से कहा: हे विदुर, इस प्रकार से शिवजी ने बर्हिषत् राजा के पुत्रों को निर्देश दिया। राजकुमारों ने भी शिवजी की असीम भक्ति और श्रद्धा के साथ पूजा की। अंत में, वे राजकुमारों की दृष्टि से ओझल हो गए।
 
Maharishi Maitraya further said to Vidur: O Vidur, Lord Shiva preached to the sons of King Barhishat in this manner. The princes also worshipped Lord Shiva with immense devotion and reverence. At last, he disappeared from the sight of the princes.
तात्पर्य
इस अध्याय में प्राचीन काल के राजशाही राज्यों से संबंधित एक महान शिक्षा निहित है। जब राजा बार्हषित अपने राजसी कर्तव्यों से सेवानिवृत्त होने पर विचार कर रहे थे, तो उन्होंने अपने पुत्रों को नागरिकों के कल्याण के लिए पूर्ण राजा बनने के लिए तपस्या करने के लिए भेजा। उसी समय, राजा बार्हषित को महर्षि नारद द्वारा भौतिक दुनिया और उस जीवित व्यक्ति के बारे में निर्देश दिया जा रहा था जो इसका आनंद लेना चाहता है। इसलिए यह बहुत स्पष्ट है कि राजाओं और राजकुमारों को राज्य का कार्यभार संभालने के लिए कैसे प्रशिक्षित किया जाता था। नागरिकों के लाभ के लिए कल्याणकारी गतिविधियों का उद्देश्य भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझना था। मानव जीवन का रूप विशेष रूप से भगवान को समझने, उनके साथ हमारे संबंध और उनकी सेवा में हमारी गतिविधियों के लिए है। क्योंकि राजाओं ने नागरिकों की आध्यात्मिक शिक्षा का कार्यभार संभाला, इसलिए राजा और नागरिक दोनों कृष्ण चेतना में खुश थे। इस संबंध में, हमें यह याद रखना चाहिए कि प्राचीनाबरिषत का राजशाही पदानुक्रम भगवान का एक महान भक्त और नारद मुनि का सबसे प्रसिद्ध शिष्य, महाराज ध्रुव से आता है। इसके बाद राजा प्राचीनाबरिषत विभिन्न प्रकार के यज्ञ करने के कारण लाभकारी गतिविधियों में बहुत अधिक लिप्त हो गए। वास्तव में विभिन्न यज्ञों को करने से व्यक्ति को उच्च ग्रह प्रणालियों या स्वर्गीय राज्यों में पदोन्नत किया जा सकता है, लेकिन मुक्ति या घर वापस जाने, भगवान के पास जाने का कोई प्रश्न ही नहीं है। जब महान ऋषि नारद ने देखा कि महाराज ध्रुव का एक वंशज फलदायी गतिविधियों से गुमराह हो रहा है, तो नारद ने उस पर दया की और व्यक्तिगत रूप से जीवन के अंतिम वरदान, भक्ति-योग के बारे में उसे निर्देश देने आए। नारद मुनि ने राजा प्राचीनाबरिषत को अप्रत्यक्ष रूप से भक्ति-योग प्रणाली कैसे दी, इसका वर्णन इस पच्चीसवें अध्याय में बहुत रोचक ढंग से किया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)