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श्लोक 4.24.69  |
इदं जपत भद्रं वो विशुद्धा नृपनन्दना: ।
स्वधर्ममनुतिष्ठन्तो भगवत्यर्पिताशया: ॥ ६९ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे राजपुत्रों, तुम विशुद्ध हृदय से अपने कर्तव्य का निर्वहन करो। भगवान के चरणों में अपने मन को लगाकर उनके इस स्तुति का जप करो। यह तुम्हारे लिए शुभ होगा क्योंकि इससे भगवान तुमसे बहुत प्रसन्न होंगे। |
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| हे राजपुत्रों, तुम विशुद्ध हृदय से अपने कर्तव्य का निर्वहन करो। भगवान के चरणों में अपने मन को लगाकर उनके इस स्तुति का जप करो। यह तुम्हारे लिए शुभ होगा क्योंकि इससे भगवान तुमसे बहुत प्रसन्न होंगे। |
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