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श्लोक 4.24.64  |
सृष्टं स्वशक्त्येदमनुप्रविष्ट-
श्चचतुर्विधं पुरमात्मांशकेन ।
अथो विदुस्तं पुरुषं सन्तमन्त-
र्भुङ्क्ते हृषीकैर्मधु सारघं य: ॥ ६४ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे मेरे प्रभु, आप अपनी शक्तियों के द्वारा सृष्टि कर लेने के बाद, सृष्टि में चार रूपों में प्रवेश करते हैं। आप जीवों के हृदय में निवास करते हैं और उन्हें तथा उनके इंद्रिय-भोगों को जानते हैं। इस भौतिक संसार का तथाकथित सुख ठीक वैसा ही है जैसा कि छत्ते में जमा होते ही मधुमक्खियों द्वारा उसका आनंद लिया जाता है। |
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| हे मेरे प्रभु, आप अपनी शक्तियों के द्वारा सृष्टि कर लेने के बाद, सृष्टि में चार रूपों में प्रवेश करते हैं। आप जीवों के हृदय में निवास करते हैं और उन्हें तथा उनके इंद्रिय-भोगों को जानते हैं। इस भौतिक संसार का तथाकथित सुख ठीक वैसा ही है जैसा कि छत्ते में जमा होते ही मधुमक्खियों द्वारा उसका आनंद लिया जाता है। |
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