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श्लोक 4.24.22  |
मत्तभ्रमरसौस्वर्यहृष्टरोमलताङ्घ्रिपम् ।
पद्मकोशरजो दिक्षु विक्षिपत्पवनोत्सवम् ॥ २२ ॥ |
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| अनुवाद |
| सरोवर के चारों ओर तरह-तरह के पेड़ और लताएँ थीं और उन पर मदमस्त भौंरे गूँज रहे थे। भौंरों के मधुर गुनगुनाने से पेड़ बहुत खुश लग रहे थे और कमल के फूलों का केसर हवा में बिखर रहा था। इन सबसे ऐसा माहौल बन रहा था मानो कोई त्यौहार मनाया जा रहा हो। |
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| सरोवर के चारों ओर तरह-तरह के पेड़ और लताएँ थीं और उन पर मदमस्त भौंरे गूँज रहे थे। भौंरों के मधुर गुनगुनाने से पेड़ बहुत खुश लग रहे थे और कमल के फूलों का केसर हवा में बिखर रहा था। इन सबसे ऐसा माहौल बन रहा था मानो कोई त्यौहार मनाया जा रहा हो। |
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