वास्तव में, जो आत्म-साक्षात्कार करता है वह स्वयं को भगवान की सेवा में आजीवन लगा देता है, इस जन्म में भी और अगले जन्म में भी। दरअसल, भक्तों के लिए इस जन्म और अगले जन्म में कोई अंतर नहीं होता। इस जन्म में एक नौसिखिए भक्त को भगवान के व्यक्तित्व के सर्वोच्च स्वरूप की सेवा करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, और अगले जन्म में वह उस सर्वोच्च व्यक्ति से वैकुण्ठ में मिलता है और वही भक्ति सेवा प्रदान करता है। यहां तक कि एक नौसिखिए भक्त के लिए भी, भक्ति सेवा को ब्रह्म-भूयाय कल्पते माना जाता है। भगवान की भक्ति सेवा को कभी भी भौतिक गतिविधि नहीं माना जाता है। चूंकि वह ब्रह्म-भूत मंच पर काम कर रहा है, इसलिए एक भक्त पहले से ही मुक्त है। इसलिए उसे ब्रह्म-भूत अवस्था तक पहुंचने के लिए किसी अन्य प्रकार के योग का अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं है। यदि भक्त आध्यात्मिक गुरु के आदेशों का कड़ाई से पालन करता है, नियमों और विनियमों का पालन करता है और हरे कृष्ण मंत्र का जाप करता है, तो यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि वह पहले से ही ब्रह्म-भूत अवस्था में है, जैसा कि भगवद-गीता (14.26) में पुष्टि की गई है।:
माम् च योऽव्यभिचारेण
भक्ति-योगेन सेवते
स गुणान समतीत्यैतान
ब्रह्म-भूयाय कल्पते
"जो पूर्ण भक्ति सेवा में लगा हुआ है, सभी परिस्थितियों में अडिग, एक ही बार भौतिक प्रकृति के तरीकों से परे हो जाता है और इस प्रकार ब्रह्म के स्तर पर पहुंच जाता है।"
