श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  4.23.8 
तेन क्रमानुसिद्धेन ध्वस्तकर्ममलाशय: ।
प्राणायामै: सन्निरुद्धषड्‌वर्गश्छिन्नबन्धन: ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार कठोर तपस्या करके महाराज पृथु धीरे-धीरे आध्यात्मिक जीवन में स्थिर हो गए और कामनाओं और इच्छाओं से पूरी तरह मुक्त हो गए। उन्होंने मन और इंद्रियों को वश में करने के लिए प्राणायाम योग का भी अभ्यास किया जिससे वे सभी कामनाओं से पूरी तरह मुक्त हो गए।
 
By performing such rigorous penance, Maharaja Prithu gradually became stable in spiritual life and became completely free from all desires of Sakaam Karma. He also practiced Pranayama Yoga to control the mind and senses, due to which he became completely free from all desires of Sakaam Karma.
तात्पर्य

इस श्लोक में प्राणायाम शब्द इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि हठ योगी और अष्टांग योगी प्राणायाम का अभ्यास तो करते हैं, परंतु सामान्यतः इसके उद्देश्य के विषय में नहीं जानते। प्राणायाम अथवा रहस्यमय योग का उद्देश्य मन और इंद्रियों को फलदायी गतिविधियों में संलग्न होने से रोकना है। पश्चिमी देशों में अभ्यास करने वाले तथाकथित योगियों को इसका कोई ज्ञान नहीं है। प्राणायाम का उद्देश्य शरीर को मजबूत और काम के लिए उपयुक्त बनाना नहीं है। इसका उद्देश्य कृष्ण की पूजा करना है। पिछले श्लोक में विशेष रूप से उल्लेख किया गया था कि पृथु महाराज द्वारा किया गया कोई भी तप, प्राणायाम और रहस्यमयी योगाभ्यास कृष्ण की पूजा की खातिर ही किया गया था। इस प्रकार पृथु महाराज योगियों के लिए भी एक आदर्श उदाहरण हैं। उन्होंने जो कुछ भी किया, वह भगवान कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए किया जो कि ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं। जो लोग फलदायी गतिविधियों के आदी होते हैं, उनका मन हर समय अशुद्ध इच्छाओं से भरा रहता है। फलदायी गतिविधियाँ भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जमाने की हमारी प्रदूषित इच्छा के लक्षण हैं। जब तक कोई भी प्रदूषित इच्छाओं के अधीन रहता है, उसे एक के बाद एक भौतिक शरीर धारण करना होगा। तथाकथित योगी बिना योग के वास्तविक उद्देश्य के बारे में जानकारी के शरीर को फिट रखने के लिए इसका अभ्यास करते हैं। इस प्रकार वे स्वयं को फलदायी गतिविधियों में संलग्न करते हैं और इस प्रकार वे किसी अन्य शरीर को स्वीकार करने की इच्छा से बंधे होते हैं। उन्हें इस बात की जानकारी नहीं होती है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य कृष्ण का होना है। इस तरह के योगियों को विभिन्न प्रजातियों के जीवन में भटकने से बचाने के लिए शास्त्र चेताते हैं कि इस युग में इस तरह का योगाभ्यास समय की बरबादी मात्र है। उन्नति का एकमात्र साधन हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करना है। राजा पृथु की गतिविधियाँ सत्य-युग में हुई थीं और इस युग में योग के इस अभ्यास को पतित आत्माओं द्वारा गलत समझा जाता है जो कुछ भी अभ्यास करने में सक्षम नहीं हैं। परिणामस्वरूप शास्त्र निषेध करते हैं, कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा। निष्कर्ष यह है कि जब तक कर्मी, ज्ञानी और योगी भगवान कृष्ण की भक्ति सेवा के बिंदु पर नहीं आ जाते, तब तक उनकी तथाकथित तपस्या और योग का कोई मूल्य नहीं होता है। नारादितः: यदि भगवान हरि, भगवान की सर्वोच्च व्यक्तित्व की पूजा नहीं की जाती है, तो ध्यान योग का अभ्यास करने, कर्म-योग करने या अनुभवजन्य ज्ञान को विकसित करने का कोई मतलब नहीं है। जहाँ तक प्राणायाम का संबंध है, भगवान के पवित्र नाम का जाप और परमानंद में नृत्य करना भी प्राणायाम माना जाता है। पिछले श्लोक में, सनत-कुमार ने महाराज पृथु को सर्वोच्च भगवान, वासुदेव की सेवा में लगातार संलग्न रहने का निर्देश दिया था:

यत्पादपंज़कजपलाशविलासभक्त्या

कर्माशयं ग्रथितमुद्ग्रथयन्ति संताः

केवल वासुदेव की पूजा करके ही कोई फलदायी गतिविधियों की इच्छाओं से मुक्त हो सकता है। वासुदेव की पूजा के बाहर, योगी और ज्ञानी ऐसी इच्छाओं से मुक्ति नहीं पा सकते हैं:

तद्वन्न रिक्तमभतयो यतयोपिरुद्ध

स्रोतोगणास्तामरणं भज वासुदेवं

( भाग। 4.22.39)

यहां प्राणायाम शब्द किसी भी छिपे हुए उद्देश्य को संदर्भित नहीं करता है। वास्तविक उद्देश्य भक्ति सेवा में संलग्न करने के लिए मन और इंद्रियों को मजबूत करना है। वर्तमान युग में पवित्र नामों का जाप करने से इस दृढ़ संकल्प को बहुत आसानी से प्राप्त किया जा सकता है: हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)