श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  4.23.6 
ग्रीष्मे पञ्चतपा वीरो वर्षास्वासारषाण्मुनि: ।
आकण्ठमग्न: शिशिरे उदके स्थण्डिलेशय: ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
ऋषियों-मुनियों के पदचिह्नों और वानप्रस्थ के नियमों का पालन करते हुए, पृथु महाराज गर्मियों में पाँच आग के बीच बैठते थे, बरसात के मौसम में बाहर बारिश में ही रहते थे और सर्दियों में गर्दन तक पानी में खड़े रहते थे। वे ज़मीन पर बिना बिस्तर के सो जाया करते थे।
 
Following the rules of Vanaprastha and the footsteps of sages and saints, Maharaj Prithu consumed Panchagnis in the summer season, stayed outside in the rainy season and stood in water up to his neck in the winter season. He slept on the ground without a bed.
तात्पर्य
यह कुछ तपस्याएँ हैं जो ज्ञानी और योगी सम्पादित करते हैं, जो भक्ति-योग की प्रक्रिया को स्वीकार नहीं कर सकते हैं। भौतिक संदूषण से मुक्त होने के लिए उन्हें इस प्रकार की गंभीर तपस्याओं से गुज़रना होगा। पाँच-तपा से पाँच प्रकार की तपिश प्रक्रियाओं का संकेत मिलता है। चारों ओर से भड़कती लपटों से और सीधे शीर्ष पर प्रज्वलित सूर्य के साथ, आग के एक घेरे के भीतर बैठने के लिए एक को निर्देशित किया गया है। यह पाँच-तपा का एक प्रकार है जो तपस्या के लिए अनुशंसित है। इसी तरह, बारिश के मौसम में व्यक्ति को बारिश की मूसलाधार बरसात के संपर्क में रहने का निर्देश दिया जाता है, और सर्दियों में गर्दन तक ठंडे पानी में बैठने के लिए निर्देशित किया जाता है। जहाँ तक बिस्तर का संबंध है, तपस्वी को केवल फर्श पर लेटकर ही संतुष्ट होना चाहिए। इस प्रकार की गंभीर तपस्याओं से गुज़रने का उद्देश्य अगली कविता में बताए अनुसार भगवान कृष्ण के परम व्यक्तित्व के प्रति समर्पित हो जाना है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)