यह भी उल्लेखनीय है कि, वैदिक आदेश के अनुसार, जंगल में रहना पूर्ण अच्छाई के मोड में रहना है, जबकि शहर में रहना लगाव के मोड में रहना है, और किसी वेश्यालय या शराब के अड्डे में रहना अज्ञान के मोड में रहना है। हालाँकि, मंदिर में रहना वैकुंठ में रहने के समान है, जो भौतिक प्रकृति के सभी मोड से परे है। यह कृष्ण चेतना आंदोलन किसी व्यक्ति को प्रभु के मंदिर में रहने का अवसर देता है, जो वैकुंठ के समान ही अच्छा है। परिणामस्वरूप, एक कृष्णभावना व्यक्ति को जंगल में जाने और कृत्रिम रूप से महाराज पृथु या महान ऋषि-मुनियों की नक़ल करने की कोशिश करने की ज़रूरत नहीं है जो जंगल में रहते थे।
श्रील रूप गोस्वामी, सरकार में मंत्री के अपने पद से सेवानिवृत्त होने के बाद, वृंदावन गए और महाराज पृथु की तरह एक पेड़ के नीचे रहने लगे। तब से, बहुत से लोग रूप गोस्वामी के व्यवहार की नक़ल करने के लिए वृंदावन गए हैं। आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करने के बजाय, कई भौतिक आदतों में फंस गए हैं और यहाँ तक कि वृंदावन में भी गैर-कानूनी यौन संबंध, जुआ और नशे के शिकार हो गए हैं। कृष्ण चेतना आंदोलन को पश्चिमी देशों में शुरू किया गया है, लेकिन पश्चिमी लोगों के लिए यह संभव नहीं है कि वे जंगल में जाकर उग्र तपस्या करें जैसा कि आदर्श रूप से पृथु महाराज या रूप गोस्वामी द्वारा किया गया था। हालाँकि, पश्चिमी या कोई और श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर के नक्शेकदम पर चल सकते हैं, जो जंगल में रहने से परे, एक मंदिर में रहते हैं, और कृष्ण-प्रसाद को स्वीकार करने की प्रतिज्ञा लेते हैं, और कुछ नहीं, नियमित सिद्धांतों का पालन करते हैं और हरे कृष्ण मंत्र के सोलह राउंड का प्रतिदिन जाप करते हैं। इस तरह, किसी का आध्यात्मिक जीवन कभी भी बाधित नहीं होगा।
