श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.23.5 
कन्दमूलफलाहार: शुष्कपर्णाशन: क्‍वचित् ।
अब्भक्ष: कतिचित्पक्षान् वायुभक्षस्तत: परम् ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
तपोवन में, महाराज पृथु कभी पेड़ों के तने और जड़ें खाते, कभी फल और सूखी पत्तियां खाते, और कुछ हफ़्तों तक तो उन्होंने केवल पानी पिया। अंत में, उन्होंने केवल हवा खाना शुरू कर दिया और केवल उसी से अपना निर्वाह करने लगे।
 
In Tapovan, Maharaja Prithu sometimes ate the trunks and roots of trees and sometimes fruits and dry leaves. For a few weeks he drank only water. Finally, he started surviving on air only.
तात्पर्य
भगवद गीता में योगियों को सलाह दी जाती है कि वे जंगल में किसी एकांत स्थान पर जाएँ और वहां एक पवित्र स्थान पर अकेले रहें। पृथु महाराज के व्यवहार से हम समझ सकते हैं कि जब वह जंगल में गए तो उन्होंने कुछ भक्तों या शिष्यों द्वारा शहर से भेजा गया कोई भी पका हुआ भोजन नहीं खाया। जैसे ही कोई जंगल में रहने की प्रतिज्ञा लेता है, उसे बस जड़, पेड़ के तने, फल, सूखे पत्ते या प्रकृति उस तरह से जो भी प्रदान करती है, खाना चाहिए। पृथु महाराज ने जंगल में रहने के लिए इन सिद्धांतों को सख्ती से अपनाया, और कभी-कभी वह सिर्फ सूखे पत्ते खाते और पानी के अतिरिक्त कुछ नहीं पीते थे। कभी-कभी वह सिर्फ हवा पर ही निर्भर रहते थे, और कभी-कभी वह पेड़ों से कुछ फल खाते थे। इस तरह वह जंगल में रहे और विशेष रूप से खाने के मामले में उन्होंने कठोर तपस्या की। दूसरे शब्दों में, अध्यात्मिक जीवन में उन्नति करने की चाहत रखने वालों के लिए अधिक भोजन करने की बिल्कुल भी सिफ़ारिश नहीं की जाती है। श्री रूप गोस्वामी भी चेतावनी देते हैं कि बहुत अधिक खाना और बहुत अधिक प्रयास (अत्याहारः प्रयाशः च) उन सिद्धांतों के ख़िलाफ़ हैं जिनके द्वारा कोई अपने आध्यात्मिक जीवन में प्रगति कर सकता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि, वैदिक आदेश के अनुसार, जंगल में रहना पूर्ण अच्छाई के मोड में रहना है, जबकि शहर में रहना लगाव के मोड में रहना है, और किसी वेश्यालय या शराब के अड्डे में रहना अज्ञान के मोड में रहना है। हालाँकि, मंदिर में रहना वैकुंठ में रहने के समान है, जो भौतिक प्रकृति के सभी मोड से परे है। यह कृष्ण चेतना आंदोलन किसी व्यक्ति को प्रभु के मंदिर में रहने का अवसर देता है, जो वैकुंठ के समान ही अच्छा है। परिणामस्वरूप, एक कृष्णभावना व्यक्ति को जंगल में जाने और कृत्रिम रूप से महाराज पृथु या महान ऋषि-मुनियों की नक़ल करने की कोशिश करने की ज़रूरत नहीं है जो जंगल में रहते थे।

श्रील रूप गोस्वामी, सरकार में मंत्री के अपने पद से सेवानिवृत्त होने के बाद, वृंदावन गए और महाराज पृथु की तरह एक पेड़ के नीचे रहने लगे। तब से, बहुत से लोग रूप गोस्वामी के व्यवहार की नक़ल करने के लिए वृंदावन गए हैं। आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करने के बजाय, कई भौतिक आदतों में फंस गए हैं और यहाँ तक कि वृंदावन में भी गैर-कानूनी यौन संबंध, जुआ और नशे के शिकार हो गए हैं। कृष्ण चेतना आंदोलन को पश्चिमी देशों में शुरू किया गया है, लेकिन पश्चिमी लोगों के लिए यह संभव नहीं है कि वे जंगल में जाकर उग्र तपस्या करें जैसा कि आदर्श रूप से पृथु महाराज या रूप गोस्वामी द्वारा किया गया था। हालाँकि, पश्चिमी या कोई और श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर के नक्शेकदम पर चल सकते हैं, जो जंगल में रहने से परे, एक मंदिर में रहते हैं, और कृष्ण-प्रसाद को स्वीकार करने की प्रतिज्ञा लेते हैं, और कुछ नहीं, नियमित सिद्धांतों का पालन करते हैं और हरे कृष्ण मंत्र के सोलह राउंड का प्रतिदिन जाप करते हैं। इस तरह, किसी का आध्यात्मिक जीवन कभी भी बाधित नहीं होगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)