श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.23.5 
कन्दमूलफलाहार: शुष्कपर्णाशन: क्‍वचित् ।
अब्भक्ष: कतिचित्पक्षान् वायुभक्षस्तत: परम् ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
तपोवन में, महाराज पृथु कभी पेड़ों के तने और जड़ें खाते, कभी फल और सूखी पत्तियां खाते, और कुछ हफ़्तों तक तो उन्होंने केवल पानी पिया। अंत में, उन्होंने केवल हवा खाना शुरू कर दिया और केवल उसी से अपना निर्वाह करने लगे।
 
तपोवन में, महाराज पृथु कभी पेड़ों के तने और जड़ें खाते, कभी फल और सूखी पत्तियां खाते, और कुछ हफ़्तों तक तो उन्होंने केवल पानी पिया। अंत में, उन्होंने केवल हवा खाना शुरू कर दिया और केवल उसी से अपना निर्वाह करने लगे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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