महर्षि मैत्रेय ने कहा : हे विदुर, पृथु महाराज के चरित्र के बारे में मैंने यथासंभव आपको बताया है जो मनुष्य की भक्तिभावना को बढ़ाने वाला है। जो कोई भी इसका लाभ उठाता है, वह भी महाराज पृथु की तरह ही भगवान् के धाम को वापस चला जाता है।
Maitreya Muni continued: O Vidura, I have described as much as possible the character of Maharaja Prithu, which increases the devotion of man. Whoever takes advantage of it, he too goes back to the abode of the Lord just like Maharaja Prithu.
तात्पर्य
उल्लिखित पिछले श्लोक में वर्णित श्रावयेत् शब्द यह इंगित करता है कि स्वयं ही न केवल पढ़ना चाहिए, अपितु अन्य लोगों को भी पढ़ने और सुनने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इसी को उपदेश कहा जाता है। चैतन्य महाप्रभु ने इस अभ्यास की सिफ़ारिश की थी: "यार देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश : "जिसे भी तुम मिलो, बस उससे कृष्ण द्वारा दिए गए निर्देशों के बारे में बात करो या उसे कृष्ण के बारे में बताओ।" (चैतन्य चरितामृत, मध्य 7.128) पृथु महाराज के भक्ति सेवा का इतिहास भी सर्वोच्च भगवान के कार्यों के बारे में वर्णन के समान ही शक्तिशाली है। किसी को भी भगवान के मनोरंजन और पृथु महाराज के कार्यों के बीच भेद नहीं करना चाहिए, और जहाँ भी ऐसा करना संभव हो, एक भक्त को दूसरों को पृथु महाराज के बारे में सुनने के लिए प्रेरित करने का प्रयास करना चाहिए। किसी को न केवल स्वयं के लाभ के लिए अपने मनोरंजन के बारे में पढ़ना चाहिए बल्कि अन्य लोगों को भी उन्हें पढ़ने और उनके बारे में सुनने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इस प्रकार सभी को लाभ हो सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥