श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  4.23.36 
विजयाभिमुखो राजा श्रुत्वैतदभियाति यान् ।
बलिं तस्मै हरन्त्यग्रे राजान: पृथवे यथा ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
यदि विजय और राज-शासन की कामना रखने वाला राजा अपने रथ पर चढ़ कर युद्ध के लिए जाने से पहले, तीन बार पृथु महाराज के चरित्र का कीर्तन करे तो उसके अधीनस्थ राजा केवल उसी के कहने पर ही सब प्रकार के कर उसी प्रकार समर्पित करेंगे जैसे महाराज पृथु के अधीन राजा उनको समर्पित करते थे।
 
यदि विजय और राज-शासन की कामना रखने वाला राजा अपने रथ पर चढ़ कर युद्ध के लिए जाने से पहले, तीन बार पृथु महाराज के चरित्र का कीर्तन करे तो उसके अधीनस्थ राजा केवल उसी के कहने पर ही सब प्रकार के कर उसी प्रकार समर्पित करेंगे जैसे महाराज पृथु के अधीन राजा उनको समर्पित करते थे।
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas