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श्लोक 4.23.36  |
विजयाभिमुखो राजा श्रुत्वैतदभियाति यान् ।
बलिं तस्मै हरन्त्यग्रे राजान: पृथवे यथा ॥ ३६ ॥ |
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| अनुवाद |
| यदि विजय और राज-शासन की कामना रखने वाला राजा अपने रथ पर चढ़ कर युद्ध के लिए जाने से पहले, तीन बार पृथु महाराज के चरित्र का कीर्तन करे तो उसके अधीनस्थ राजा केवल उसी के कहने पर ही सब प्रकार के कर उसी प्रकार समर्पित करेंगे जैसे महाराज पृथु के अधीन राजा उनको समर्पित करते थे। |
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| यदि विजय और राज-शासन की कामना रखने वाला राजा अपने रथ पर चढ़ कर युद्ध के लिए जाने से पहले, तीन बार पृथु महाराज के चरित्र का कीर्तन करे तो उसके अधीनस्थ राजा केवल उसी के कहने पर ही सब प्रकार के कर उसी प्रकार समर्पित करेंगे जैसे महाराज पृथु के अधीन राजा उनको समर्पित करते थे। |
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